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Monday, October 24, 2011

दीपावली के उपलक्ष पर...मेरी कविता...

एक बार एक था भक्त विक्रम आहूजा।
जो करता था बहुत पाठ और पूजा ॥
गरीब था मगर कोई न दुःख था ।
वो इतनी गरीबी में भी खुश था ॥

रोज़ सुबह उठकर बोलता था सबको जय राम जी की ।
करता था विधिवत पूजा श्री गणेश जी की और लक्ष्मी जी की ॥
कुछ न होकर भी उसके पास बहुत सा ज्ञान और तेज था ।
उधर वो मन से भी बहुत संतुष्ट और शांत था ॥

दिवाली के दिन को वो मनाता था इस उत्सव को विधिवत ।
दीयों की लड़ियाँ तो नहीं थी पर जलाता था दिया एक हर वक़्त ॥
विक्रम की भक्ति देख....एक दिन हुई लक्ष्मी जी बहुत प्रसन्न ।
दिया उन्होंने उसे खुश होकर वरदान में बहुत धन ॥
लक्ष्मी जी के आगमन से हुआ उसका घर धन्य और पवान ।
तिजोरी देख बने उसके कुछ मित्र जो दिल से बिलकुल थे काले और रावण

धीरे धीरे उस पर चड़ा धन से धन बनाने का नशा ।
मदमस्त हुआ वो खोला उसने व्यापार एक जिसमें बहुत था नफा ॥
खूब तिजोरी भरने लगी.. फिर उसके बने काफी मित्र बहुत था वो खुश ।
इस बीच वो भूल गया अपनी भक्ति और होने लगे सब देवगन उस से रुष्ट ॥

सब मित्रों संग उत्सव मनाता.. खूब खिलाता.. खूब पिलाता ।
दिवाली आती जब वो खूब धन आतिशबाजी में लगता ॥
नए नए यंत्रो से फिर वो खूब सारी रोशनियाँ दीयों सी सजाता ।
कितने बम, कितने पटाखे, कितने रोकेट, कितने अनार और कितना धुँआ फैलाता ॥

पूरी जवानी अब बीत चली थी उसका बुढ़ापा आ चूका था ।
कितने घर और कितने कीमती गहने.. वो तिजोरी खाली कर चूका था ॥
कमजोर तो हो गया था... उसको अब बहुत सा हो गया गम ।
उसके गले की हालत बहुत थी बुरी हो गया था उसे दम ॥

अब जब भी दिवाली आती ।
उसकी ख़ासी रुक नहीं पाती ॥
उसको अपनी गलती तब याद आती ।
क्या इतना था वो मदमस्त की इतनी समझ न उसको आती ॥
कितना धुँआ था वो उड़ाता ।
वही धुँआ अब वो है खाता ॥

बिमारी से उसे हुआ एहसास ।
अब तो रुक जाएगी जैसे उसकी साँस ॥
अपने प्रभु से रोज़ मौत मांगता ।
सबको पवन को दुषित न करने को कहता ॥
पर उसको मिलती इतनी आसान मौत कभी ना ।
अभी तो था उसे बहुत कुछ भुगतना ॥

सोचता था वह अकेला था न कोई मित्र और न साथी ।
कितना किया उसने दुषित पवन कितना था वह उधमाती ॥
कितनो को उसने यह दी बिमारी..कितनो की साँसे थी ली उसने छीन ।
धुए ने कितनो को मारा... कितनो को किया परेशान और कितना भयबीन ॥

सबको अब वह यही समझाता की यह दिवाली का पर्व है ।
जो है बहुत सुखमय और पावन और जिस पर हर व्यक्ति को गर्व है ॥
भाईओं मेरी तरह तुम ना धुँआ उडाना ।
बिन बात के धन को तुम यूँ ना गवाना ॥
यह दिवाली तुम दीयों से मानना ।
कम पटाखे और कम पीना पिलाना ॥
परिवार संग पाठ पूजा करवाना ।
लक्ष्मी जी को तुम घर अपने बुलाना ॥
सोच समझ कर तुम दिवाली मानना रावण जैसे मित्र न बनाना ।
उनकी किसी भी गलत बातो में खुद न शामिल तुम हो जाना ॥
घर को अपने खूब सजाना.. मगर मंदिर में भी दिए जलाना भूल न जाना ।
आतिशबाजी नहीं अब पूजा, मिठाइयों, दीयों और रंगोलियों से ही बस दिवाली मानना ॥
~'~hn~'~
(HAPPY DIWALI TO ALL My FRIENDS)

4 comments:

Simran said...

What a blasting post on diwali :)
I'm amazed to see your settings of rhymes... :)

happy Diwali :)

चैतन्य शर्मा said...

दिवाली की शुभकामनायें ..हैप्पी दिवाली :)

Hema Nimbekar said...

@Simran

Thanks simran....Happy Diwali to you as well..

Hema Nimbekar said...

@चैतन्य शर्मा

.....WELCOME TO MY BLOG...

आपको भी दिवाली की शुभकामनायें....

How u find my blog??

लिखिए अपनी भाषा में

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