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Monday, December 12, 2011

मेरे 100 साल की कहानी : दिल्ली

यूँ तो मेरे अस्तित्व की कहानी
है बहुत बरसो बरस पुरानी
जुड़ी है मुझसे बहुत सी कहानी
कुछ नयी सी कुछ है पुरानी

है 100 साल बात यह पुरानी
मुग़ल थे गए अंग्रेजो की थी गुलामी
  था आज का ही दिन मगर रूमानी
बनाया गया मुझे भारतवर्ष की राजधानी

बहुत लम्बा सफ़र किया मैंने तेय
बहुत से राजाओं के राज आये और गए
मेरा कोई अपना नहीं यहाँ पर
बाहर से लोग आते ही मुझे अपनाते गए 

सबको मैंने अपना समझा
माँ जैसे ही पुचकारा सहेजा
कुछ न कुछ वो देते गए मुझे
दिल भी अपना दे गए मुझे
 
हूँ गवाह मैं गुलामी की जंजीरों की 
नेताजी के दिए "दिल्ली चलो" के नारों की
गाँधी जी की "भारत छोड़ो" ललकार की
साक्षी हूँ मैं संविधान के पत्राचार की

बटवारे के दर्द लिए
आये बहुत से लोग यहाँ
दी मैंने पनाह उन्हें
अपनाया प्यार से यहाँ 

पुराने किले और लाल किले के बाद
देखे मैंने कई घर हवेली आबाद
connaught place की जनम देखा
देखी उसकी जवानी नाबाद

रायेसेना पर बना भवन पारलौकिक
सत्ता की उलट पलट राजनितिक
होती है देश भर की नीतियाँ तेय यहाँ
संसद में होती विस्तार से चर्चा जहाँ

गाँधी की हत्या नेहरु की भारत एक खोज
फिर इंद्रा का कड़क नेतृत्व और सटीक फौज
देश को समर्पित राजेंद्र प्रसाद जी की सोच
राजीव गाँधी की युवा के संग नवभारत की सोच

टांगों को दौड़ते पाया अपनी गलियों में
 ट्राम, मेट्रो की भी शान देखी गलियों में
टीवी, रेडियो का दौर है देखा
अब कंप्यूटर भी लगे सरीखा 

देखे मैंने बहुत से चांदनी चौक के मेले
छोटी छोटी गलियों में सामान बेचते ठेले
बाजारों, कटरों में भी भीड़ उमड़ती
  कुछ आनो में ही दुनिया सिमटती 

 चटकारों की दुनिया बाज़ारों की दुनिया
रंगबिरंगी दुनिया त्योहारों की दुनिया
सबसे कमाऊ दुनिया सबसे खर्चीली दुनिया
द्हेशत की दुनिया विस्फोटों की दुनिया

मेरी हर बात है निराली
यहाँ के लोग है बहुत कमाली
दिल दे के भी दिल है जीत लेते
सब कुछ खो के भी प्यार पा लेते

आज बहुत कुछ है बदला सा अलग तलख
सहजता है गायब वही सजीला जो है अलग तलख
यहाँ इंसान हो गया बिंदास अपनापन खो कर भी
है सामाजिक जागृत समाज से दूर हो कर भी

जगह नहीं रहने को अब फिर खालीपन सा है
दिल्ली में रह कर भी कोई नहीं दिल्ली वालो सा है 
आज कोई महिला सुरक्षित नहीं यहाँ है
 हर तरफ आतंक का हाहाकार फैला यहाँ है
 
है बहुत सी दुनिया सिमटी मुझमें
है बहुत से यादो के दौर मेरे मन में
बीतें ये 100 साल चुटकियों से क्षण में
 बताऊँ कैसे मैं आप बीती बस कुछ शब्दों में
~'~hn~'~

Monday, November 14, 2011

इंतज़ार

दोस्तों मैं जानती हूँ की आप लोग मुझे और मेरे ब्लॉग को बहुत प्यार करते है....और आप सब मेरे मन में अक्सर आने वाले कुछ नकारात्मक विचारों से भी अवगत होंगे...मेरे कुछ पोस्ट में आपको अक्सर महसूस होता होगा...जो की सच है....क्यूंकि जब में ज्यादा उदास होती हूँ....ज्यादा सोचती हूँ....तभी एक नयी रचना कर बैठती हूँ....आज कुछ ऐसे ही विचार मेरे मन में आ रहे है....आप लोगो के साथ बाँटना चाहती हूँ...

इंसान की ज़िन्दगी बस 60-70 साल ही होती होगी....और मैं जैसे-जैसे 30 के पास आती जा रही हूँ...तो मुझे मेरी बीती ज़िन्दगी का विश्लेषण करने का मन हुआ...और मैंने पाया की मेरी 30 साल की ज़िन्दगी में मैंने बहुत कुछ पाया है...बहुत कुछ खोया भी है...माँ की कोख छोड़ी तो मासूम बचपन पाया....जब बचपन खोया तो लड़कपन पाया...लड़कपन के जाते ही खूब सारी समझ लिए जवानी आ गयी...
सच में तोतलाना सीखा तो किलकारियां कहीं घूम सी गयी....और जब अच्छे से बोल चाल आ गया तो तोत्लाहत भी जाती रही...तोलमोल के...सोच समझ के बोलना सीखा तो सारी मासूमियत और अल्हड़पन भी जाता रहा....

जानती हूँ अभी बहुत कुछ आगे है मेरी ज़िन्दगी में...अभी आधा ही सफ़र तय हुआ है...मगर फिर भी दोस्तों यह तो सच है की कुछ पाया तो कुछ खोया...मगर पाया बहुत इंतज़ार के बाद...इंतज़ार का फल बहुत मीठा होता है..यह तो सभी कहते है...मगर जब किसी को सच में लम्बे इंतज़ार के बाद कुछ मिलता है तो वही जानता है जो उसे मिला उसकी क्या एहमियत है उसके लिए...बच्चा इस दुनिया में आने से पहले भी 9 महीने इंतज़ार करता है...उसे नयी ज़िन्दगी मिलती है.....मगर 60-70 सालों बाद यही ज़िन्दगी उसे छोडनी पड़ती है....मौत यही तो है ज़िन्दगी का आखरी पड़ाव....इसका इंतज़ार भी हम ज़िन्दगी भर जी-जी कर करते है...सच में अब तो मैं यही पूछती हूँ.....

मेरी ज़िन्दगी क्या है?,
बस एक इंतज़ार,
एक लम्बा इंतज़ार....

9 महीने की कोख के बाद,
मेरी पहली किलकार,
जैसे हो संघर्ष की ललकार...

5 साल बोल-चाल की कुदरती सीख,
फिर सीखा शिष्टाचार,
जो है जीवन का आधार...

लम्बी किताबी शिक्षा ले कर ही,
बन पायी होनहार,
फिर भी हूँ बेरोजगार...

बचपन से अभी तक सपनो में देखा,
सपनो का राजकुमार,
जिससे होगा मेरा घर-संसार...

सपने है अभी इस जैसे और कई,
पूरे होने को बेक़रार,
है किस्मत पे ऐतबार...

28 सालों की इंतज़ार की घड़ी चलेगी, 
और कितने साल लगातार,
इसके रुकने का है बस इंतज़ार...

अभी तक की मेरी ज़िन्दगी,
आधा-अधूरा इंतज़ार,
क्या पूरा होगा ये इंतज़ार...

~'~hn~'~

Monday, October 24, 2011

दीपावली के उपलक्ष पर...मेरी कविता...

एक बार एक था भक्त विक्रम आहूजा।
जो करता था बहुत पाठ और पूजा ॥
गरीब था मगर कोई न दुःख था ।
वो इतनी गरीबी में भी खुश था ॥

रोज़ सुबह उठकर बोलता था सबको जय राम जी की ।
करता था विधिवत पूजा श्री गणेश जी की और लक्ष्मी जी की ॥
कुछ न होकर भी उसके पास बहुत सा ज्ञान और तेज था ।
उधर वो मन से भी बहुत संतुष्ट और शांत था ॥

दिवाली के दिन को वो मनाता था इस उत्सव को विधिवत ।
दीयों की लड़ियाँ तो नहीं थी पर जलाता था दिया एक हर वक़्त ॥
विक्रम की भक्ति देख....एक दिन हुई लक्ष्मी जी बहुत प्रसन्न ।
दिया उन्होंने उसे खुश होकर वरदान में बहुत धन ॥
लक्ष्मी जी के आगमन से हुआ उसका घर धन्य और पवान ।
तिजोरी देख बने उसके कुछ मित्र जो दिल से बिलकुल थे काले और रावण

धीरे धीरे उस पर चड़ा धन से धन बनाने का नशा ।
मदमस्त हुआ वो खोला उसने व्यापार एक जिसमें बहुत था नफा ॥
खूब तिजोरी भरने लगी.. फिर उसके बने काफी मित्र बहुत था वो खुश ।
इस बीच वो भूल गया अपनी भक्ति और होने लगे सब देवगन उस से रुष्ट ॥

सब मित्रों संग उत्सव मनाता.. खूब खिलाता.. खूब पिलाता ।
दिवाली आती जब वो खूब धन आतिशबाजी में लगता ॥
नए नए यंत्रो से फिर वो खूब सारी रोशनियाँ दीयों सी सजाता ।
कितने बम, कितने पटाखे, कितने रोकेट, कितने अनार और कितना धुँआ फैलाता ॥

पूरी जवानी अब बीत चली थी उसका बुढ़ापा आ चूका था ।
कितने घर और कितने कीमती गहने.. वो तिजोरी खाली कर चूका था ॥
कमजोर तो हो गया था... उसको अब बहुत सा हो गया गम ।
उसके गले की हालत बहुत थी बुरी हो गया था उसे दम ॥

अब जब भी दिवाली आती ।
उसकी ख़ासी रुक नहीं पाती ॥
उसको अपनी गलती तब याद आती ।
क्या इतना था वो मदमस्त की इतनी समझ न उसको आती ॥
कितना धुँआ था वो उड़ाता ।
वही धुँआ अब वो है खाता ॥

बिमारी से उसे हुआ एहसास ।
अब तो रुक जाएगी जैसे उसकी साँस ॥
अपने प्रभु से रोज़ मौत मांगता ।
सबको पवन को दुषित न करने को कहता ॥
पर उसको मिलती इतनी आसान मौत कभी ना ।
अभी तो था उसे बहुत कुछ भुगतना ॥

सोचता था वह अकेला था न कोई मित्र और न साथी ।
कितना किया उसने दुषित पवन कितना था वह उधमाती ॥
कितनो को उसने यह दी बिमारी..कितनो की साँसे थी ली उसने छीन ।
धुए ने कितनो को मारा... कितनो को किया परेशान और कितना भयबीन ॥

सबको अब वह यही समझाता की यह दिवाली का पर्व है ।
जो है बहुत सुखमय और पावन और जिस पर हर व्यक्ति को गर्व है ॥
भाईओं मेरी तरह तुम ना धुँआ उडाना ।
बिन बात के धन को तुम यूँ ना गवाना ॥
यह दिवाली तुम दीयों से मानना ।
कम पटाखे और कम पीना पिलाना ॥
परिवार संग पाठ पूजा करवाना ।
लक्ष्मी जी को तुम घर अपने बुलाना ॥
सोच समझ कर तुम दिवाली मानना रावण जैसे मित्र न बनाना ।
उनकी किसी भी गलत बातो में खुद न शामिल तुम हो जाना ॥
घर को अपने खूब सजाना.. मगर मंदिर में भी दिए जलाना भूल न जाना ।
आतिशबाजी नहीं अब पूजा, मिठाइयों, दीयों और रंगोलियों से ही बस दिवाली मानना ॥
~'~hn~'~
(HAPPY DIWALI TO ALL My FRIENDS)

Thursday, October 20, 2011

लो आ गयी दीपावली

सजा दो हर तरफ .... लगाओ दीपो की माला.. लो आ गयी दीपावली ।
रावण का नाश कर राम-सीता जी घर लौट कर है आये... पूरी अयोध्या झूमे बन मतवाली ॥
वहां चाँद भी है गायब आसमान में... जैसे खो गया हो इस चमकती बिजलियों में ।
विजय पर्व के बाद अब आया खुशियों का त्यौहार... हर कोई है खुश यहाँ इन रोशनियों में ॥

फुलझड़ी, फिरकनी या हो अनार, रोकेट सब हो गए रौशनी में घूम ।
सब है खुशियों का प्रतीक, फिर भी है सबकी अपनी चमक अपना दूम ॥
यह पटाकों की लड़ी जली.. यह फूटा बड़ा बम ।
धूधूममम... धडाडाडाडाममम... बूमम बूमम ॥
कुछ है फुस्सी और कुछ धमाकेदार... कुछ है रंगीले... कुछ है चमकदार ।
शाम को होती मुहरत पे पूजा... सब गाते आरती गणेश जी की और लक्ष्मी जी की बार बार ॥

कितनो को शौक यहाँ बाजी लगाने का... हर कोई चाहे अपनी किस्मत को आजमाना ।
किस्मत के खेल हैं देखो कहीं दिवाली बोनस.. तो कहीं पर निकला किसी का दिवाला ॥
कहीं पर है लक्ष्मी जी की कृपा और है नए साल के अवसर पर शुभ करता गणेश जी की जय जयकार ।
सब जगह हो मंगलमय और खुशियाँ अपरमपार करके... सब दुष्टो का हो स्रंघार ॥

रंगोली है करती सब रंगों से इन खुशियों को सत सत नमस्कार ।
मिठाइयाँ है बाटते सभी..लोगो को कहते "आप पर हो प्रभु की कृपा अपरमपार" ॥
अनार की तरह सब और खुशहाली हम फैलाये, फिरकनी की भाँती हम सब जगह की सैर करके आये ।
रोकेट के सामान हम जाए बहुत दूर तक.. इन दीयों की रौशनी जैसी शुद्ध और स्वछ विचार ही मन में लाये ॥

कुछ लोग रावण के है भक्त यहाँ.. इस अवसर पर भी नहीं सोचते है भाला ।
खुद को इतना अहसाए और सही बताते.. और लेंगे कितने मासूमो की जान भला ॥
खुद तो मानव बोम्ब बन जाते.. और कितनो को यह दिवाली जैसे पावन पर्व पे दुःख है दे जाते ।
ज्यादा से ज्यादा लोगो को यह अपना निशाना बनाते.. पर अभी तक हमारी मानवता को नहीं है मिटा यह पाते ॥

रावण बहुत से है यहाँ.. मगर राम भी कम नहीं.. यह भूल जाते ।
कितना भी कुछ कर ले रावण राम की धर्म निति से कभी न वो जीत पाते ॥
आतंक के इस राक्षस को हम अपनी मानवता से ही मिटायेंगे ।
आज नहीं तो कल हम इस दिवाली को खूब धूम धाम से मनाएंगे ॥

यह लो रोकेट और candle kites फिर आसमान में दिखे ।
कितने लोगो के चेहरे पे दुःख और भय नहीं दिखे ॥
लो एक बार फिर है फुलझड़ी है जली कितने बिजली बोम्ब है फुठे ।
बस यही दुआ है मेरी की इस दिवाली लक्ष्मी जी किसी से न रूठे ॥

सबको मेरी और से दीपावली की बहुत बहुत शुभकामनाए ।
सबका भविष्य हो जीवंत, खुशहाल और रौशनीमय ॥
कुल के दीपक ही दीयों की तरह जलते रहे और जगमगाए ।
चाहे दिए की लौ की तरह वो कितना डगमगाए ॥
पर कही भी उनकी रौशनी इस दिए को न आग लगाए ।
आज आप उनको और कल वो आपको सहारा दे और समझाए ॥ 
~'~hn~'~

Wednesday, October 19, 2011

Happy Blogoversary Simran

We always remember the first things in our life....like first day of the school or college....first writing, first mobile, getting top marks for first time, first surprise party or gift, etc..etc....

well I don't remember when i got to know my sweet little friend simran...when we first talked....when we first laugh with each other, agreed with each other, having different views on something...because being with her is always something new experience...every time she amazes me with her cheering personality, matured views and new way to express her feelings....

I first read her blog....and wondering how she think such mature.....she introduced me to new world.....(though i was blogging with another id of mine...where i write only for me and few readers of mines....and already eventually stopped posting)....she encourages me to write again....start sharing my writing again...Start a new blog......and i did...

then slowly she take me to another world.... and i met lots of bloggers.... where we all share, care and discuss many precious things about life, soul, social and ourselves... thanks to simran... I found to many friendship bonds... with Alpana Di, Mohini, Sancheeta, Melissa, Harshal, Monu and many more.....Not only to her blogger friends but she really get me somewhere connected with her Granny's poems... there are lots of ways she and her blog... "My Friendship" have impact on me and my personality....I adore her....I love her.....
On her Blogoversary... I want to say some lines about her and her blog...(I know most of you people who know her agreed with me at some points)

Happy Blog Anniversary My sweet Little Simran

कुछ ख़ास है....सबके दिल के बहुत पास है
कुछ ऐसा रिश्ता है दिलों से इस ब्लॉग का
कि सबकी भावनाओ की भुझाता यह प्यास है

हर पोस्ट लगे अपना सा....हर शब्द लगे अपने से
सबकी सपनो की तलाश पूरी होती बस आपको पढ़ते ही
नींद की ज़रुरत अब किसे यहाँ हर भाव लगे सपने से

हर बार नया कुछ.....थोडा नहीं है बहुत कुछ
जो पढ़े तुम्हे कोई भी फिर कहीं और न जाता है
बिन तारीफ किये फिर वो न जाता असर ऐसा कुछ

कई नए दोस्त बने....दो नदियों के पुल तुम बने
जोड़ा कितने भटकों को एक दुसरे से तुमने
तुमसे ही शुरू और ख़त्म नए किस्से कहानियां बने

जो तुमसे जुड़ जाता है....लिखनी का कायल हो जाता है
हाँ तुम छोटी हो पर इस उम्र में भी क्या गज़ब लिखती हो
गहरी सोच और सपनो की उड़ान देख हर शख्स दंग रह जाता है

रिश्ते, प्यार, दोस्ती,....और देर सारी मस्ती
ज़िन्दगी के कई रूप बताती जीने का मतलब समझाती
तजुर्बे, सीख, हास्य, प्यार, आशीर्वाद दादी माँ सी हस्ती

~~hn~~

Tuesday, October 18, 2011

अनजाना सा रिश्ता (part 6) (last part)

माहि के मोबाइल पे कुनाल का वो SMS पढ़ कर तो मेरे होश ही उड़ गए.....मैंने inbox में पिछले कुछ SMS भी पढ़े...हर SMS माहि की बेवफाई की चीख चीख कर गवाही दे रहा था....sent items में भी माहि ने कुनाल को कुछ ऐसे ही SMS भेजे हुए थे....पता नहीं यह कब से चल रहा था....कुनाल माहि का ex-boyfriend है यह तो माही ने मुझे पहले भी बताया था....पर आज भी वो दोनों.....

मुझे अपने कमरे में ही घुटन सी होने लगी.....सांस नहीं ली जा रही थी मुझसे...ताज़ी हवा खाने बाहर निकल गया....एक एक SMS को बार बार पढता रहा..पर एक बार भी उसका एक शब्द भी नहीं बदला.....होटल के lawn में जा कर मुझे सांस आई पर दिल और दिमाग अभी भी सुन्न ही था....
फिर माहि भी वहां मुझे ढूंढते हुए आ गयी....."पियूष...पियूष...तुम यहाँ क्या कर रहे हो...तुमने मेरा मोबाइल देखा.." इस से पहले वो कुछ और बोले मैंने उसे उसका मोबाइल थमा दिया...और जोर से बोला...."माहि मैं सारे SMS पढ़ लिए है.....तुम और कुनाल....आखिर क्या चल रहा है...यह सब मेरे होते हुए...मेरे साथ तुम ऐसा कैसे कर सकती हो" सारे सवाल एक साथ पूछ लिए.....

"पियूष....मुझे मत बताओ...जैसे तुम्हे कभी भी मुझ पर शक नहीं हुआ..तुमको जैसे कभी पता नहीं चला मेरे और कुनाल के बीच क्या है.....we are F**K buddies...just like you and Siya ....so just chill baby..." माहि का जवाब मेरा गुस्सा सातवे आसमान पे पहुचने के लिए काफी था...."यह क्या अनाप शनाप बोल रही हो...सिया और मैं बस दोस्त है.....अच्छे दोस्त....सिया एक अच्छी लड़की है उसके बारे तुम ऐसा सोच भी कैसे सकती हो.." मुझे बीच में ही काटते हुए माहि एक बार बोली....."रहने दो..जैसे मैं नहीं जानती रात-रात भर एक लड़का और लड़की एक साथ कौन सी पढाई करते है...."
"सिया और मैं एक साथ पढाई ही करते थे....कई बार तो वो मेरे नोट्स बनती थी जब मैं तुमसे फ़ोन पे बात किया करता था..."

माहि ने फिर मेरी बात पूरी नहीं होने दी..."इसमें कौनसी बड़ी बात है...कई बार मैं भी कुनाल की बाँहों से ही तुमसे फ़ोन पे बात किया करती थी...और अगर सिया और तुम सच में रात भर पढ़ते थे तो तुमने कभी मुझे वो सुख क्यूँ नहीं दिया...तुमने नहीं दिया तो मैंने अपने ex-boyfriend से मांग लिया जो मेरी इस मांग का हमेशा ख्याल रखता था....."
"छी.....कितनी घटिया सोच है तुम्हारी...." मैंने कहना शुरू ही किया था....की सिया की आवाज़ कानो पे पड़ी...."माहि ये क्या बोले जा रही हो.....हम बस अच्छे दोस्त है.....एक साथ पढ़ते थे बस.....ऐसा कुछ नहीं जैसा तुम बोल रही हो....पियूष तुमको बहुत प्यार करता है..."

"चलो एक बार तुम्हारी बात मान भी लेते है पर जिस तरह से तुम एक दुसरे का ख्याल रखते हो...यह तुमको यहाँ ले आया क्यूंकि तुम्हारी दुःख की घडी में अकेला नहीं छोड़ सकता था...पर मेरे अच्छे खासे प्लान को ख़राब कर मुझे अकेला छोड़ कर तुम्हारे घर जा सकता है...और जब तुम एक दुसरे की बात बिना बोले समझ जाते हो...कब किसको क्या चाहिए..उसको तुम क्या कहोगी...इस अजीब सी chemistry को क्या नाम दोगी..." माहि ने सिया से तपाक से पुछा...

थोड़ी देर एक दुसरे पे छीटा-कसी चलती रही....मेरा तो मन कर रहा की काश ये सब सूनने से पहले मेरे कान क्यूँ नहीं ख़राब हो गए...पता नहीं सिया क्या सोच रही होगी...माहि गुस्सा होके होटल में जा कर अपने माँ-पाप को लेके होटल से चली गयी.....मेरा सर दर्द और गुस्से से फटा जा रहा था...

सिया ने मुझे संभाला.....देर तक मैं उसके कंधे पे सर रख कर रोता रहा....फिर खुद को संभाला...और सिया की आँखों में देखा....सोच रहा था..सिया lawn में क्या कर रही है.....तो सिया की आँखों में मुझे मेरा जवाब भी मिल गया...."नयी जगह है नींद नहीं आ रही थी तो सोचा थोडा लवण में घूम लेने से शायद अच्छा लगे"....फिर मेरी आँखों ने उस से माहि की तीखी बातों के लिए माफ़ी मांगी..और सिया ने आँखों से ही कहा.."चलो अंदर चले.."

"कुछ देर मैं येही रहना चाहता हूँ...तुम जाओ...जा कर सो जाओ.." मैंने सिया से कहा...वो कुछ नहीं बोली पर अंदर भी नहीं गयी वहीँ मेरे साथ खड़ी रही.....पता नहीं हम कब तक वहां खड़े रहे....पर सुबह होते ही सब को ले कर वापस अपने घर चल दिए....सिया को भी माँ-पापा ने साथ चलने को कहा...और जब तक कॉलेज शुरू नहीं होता..सिया हमारे घर ही रही....उसने मुझे संभाला और मैंने उसे....

कॉलेज के दुसरे साल हम लोग के subjects अलग-अलग हो गए थे...उसने Marketing और मैंने IT के विषय चुने थे....शुरू के कुछ दिनों तक हम अलग अलग अपने कमरों में ही पढते थे....पर पता नहीं क्यूँ पढाई में मन ही नहीं लगता था....और एक रात वो पहले की तरह मेरे कमरे के दरवाजे पे अपनी किताबे लिए खड़ी थी...फिर से हमारी देर रात तक की पढाई एक साथ शुरू हो गयी....वो अपने हॉस्टल से छुप के पीछे के रास्ते से हॉस्टल से बाहर आ जाती और मेरे कमरे में आ जाती....और सुबह होने से पहले उसी रास्ते से वापस अपने कमरे तक पहुँच जाती....सुहाना उसकी मदद करती थी....

अब तो भावेश भी नहीं हुआ करता था...तो कभी-कभी वो भावेश के बिस्तर पर भी सो जाती थी...मैं सुबह उसे सोते हुए निहारता रहता....सोते हुए बहुत ही मासूम और सुंदर लगती थी....हमारी पढाई फिर से अच्छी होने लगी....और हमारी दोस्ती भी वापस फिर से पहले जैसी हो गयी थी.....हाँ अब हम एक दुसरे tease नहीं किया करते थे....कभी जब मुझे माहि की याद आती और मैं उदासा हो जाता...तो वो मेरा होसला बढाती..."focus ...focus पियूष..पढाई पे focus करो....target placement है उस पर नज़र रखो.....past को भूल जाओ..."....और कभी वो अपने पापा को याद कर रोती तो मैं अपना कन्धा आगे बढ़ा देता...और कहता..."तुमको कुछ बनके दिखाना है...तुम्हारे पापा तुमको देख रहे है....तुमको अपना बिज़नस करना है.....अपनी माँ और भाई का ख्याल रखना है..." सच कहूँ तो इतने बड़े institute में हम एक दुसरे में परिवार नज़र आता था.....

धीरे-धीरे समय बीतने लगा.....हम अब बाहर भी घुमने जाते थे....कभी कभी हम दोनों अकेले होते थे..तो कभी सभी friends के साथ.....और एक दिन सिया को मैं भावेश से बात करते देखा....जो की मुझे अच्छा नहीं लगा...सिया से पुछा तो उसने बताया...भावेश ने उसे Date के लिए पुछा है....मैंने सिया का जवाब पुछा तो उसने बताया...हाँ एक Date में क्या हर्ज है ..बस एक Date ही तो है....और कुछ नहीं...भावेश को उसने साफ़ बता दिया की यह बस एक Date ही है..और आगे कुछ नहीं.....

जिस दिन वो दोनों Date पे गए मैं पूरा समय बेचैन सा रहा....हलाकि मुझे पता था...सिया भावेश के साथ कोई serious relationship नहीं रखना चाहएगी....मगर फिर भी पता नहीं क्यूँ.....शायद भावेश पर जो भरोसा नहीं था...

सिया ने बताया भावेश के साथ उसकी Date अच्छी थी...भावेश इतना बुरा नहीं है.....उसकी भावेश के साथ दोस्ती हो गयी है...भावेश ने उस से माफ़ी भी मांग ली है...और अब सब ठीक है....यह सब बातें मेरे दिलो-दिमाग में 2-4 दिन तक घुमती रही और कुछ दिनों बाद मैंने सिया से पूछ ही लिया...."अब तुम ही बस मेरी एक girlfriend रह गयी हो...तो क्या मेरी girlfriend मेरे साथ पहली date पे चलेगी.."...."पियूष...अब हम एक दुसरे तो tease नहीं करते..." सिया ने कहा

सिया का मायूस चेहरा देख कर मैं थोड़ी देर बाद सोच कर बोला "लेकिन अगर मैं tease नहीं कर रहा हूँ तो..मेरा मतलब सचमुच में मैं तुमको Date करना चाहता हूँ.....बस एक date ..."....सिया ने मेरी आखों में देखा और उत्सकता से पुछा.."Real Date ...मतलब बिलकुल फ़िल्मी".....फ़िल्मी शब्द सुन कर मैं डर गया...उसके लिए फ़िल्मी मतलब....कैसी Date ...मैं सब कुछ तरीके से करना चाहता था...जिस से सिया खुश हो जाए....इस में सुहाना ने मेरी मदद की...उसने सिया की पसंद-नापसंद मुझे बताई....उसकी सपनो की Date....कौन सी Date को वो फ़िल्मी Date कहती है..सब जान लिया सुहाना से...हलाकि सुहाना ने मुझे अच्छे से छेड़ा.....वो जानना चाहती थी आखिर मैं क्या करने वाला हूँ.....कहीं सिया को propose तो नहीं करने वाला...लड़कियां भी ना...और इन् लड़कियों के सपने....फूल...लाल heart shape के गुब्बारे...फिल्म....shopping ....उफ्फ्फ्फफ्फ़....

मेरी और सिया की पहली official Date वाले दिन

मैंने डेट के लिए सब कुछ तैयार कर रखा था...सब प्लान कर रखा था....कब क्या कैसे करना है...कैसे सिया को हेरान और surprise करना है...बिलकुल वैसे जैसा उसने सपनो में date की कल्पना की होगी...यकीं नहीं हो रहा था...की मैं एक सचमुच की date पे जा रहा हूँ अपनी उसी काल्पनिक girlfriend के साथ उसकी काल्पनिक date के बिलकुल मुताबिक....मुझे नहीं पता था आगे क्या होगा...वो कैसे इस सब को लेगी....अंदर ही अंदर डर लग रहा था.....क्या वो भी मेरे लिए ऐसे ही सोचती होगी.....मुझे मालुम है की वो मेरे सपनो की रानी नहीं है...जैसा मैंने सपनो में सोचा है वो वैसी नहीं है...बिलकुल अलग है..मेरी सोच से भी परे....मगर जैसी भी वो है मेरे लिए बिलकुल सही है...या फिर मेरी पहुँच से भी आगे है...क्यूंकि इतनी अच्छी लड़की...मेरे लिए....खेर अब जो होगा देखा जायेगा....उसकी हाँ होगी तो मैं उसे कभी अपने से अलग नहीं होने दूंगा....हमेशा खुश रखूँगा.....और न होगी तो भी हमारी दोस्ती में कोई फरक नहीं आयेगा....यह सब सोचते सोचते मैं तैयार हो कर हॉस्टल से बाहर आ ही रहा था.....की मैंने अपने सामने माहि को खड़ा पाया....

माहि मुझसे कुछ बात करना चाहती थी.....तो इसलिए मैं उसे अपने कमरे में ले आया....और उसने कमरे में आते ही कहा..."पियूष....मैं यहाँ तुमसे माफ़ी मांगने आई हूँ....उस दिन जो कुछ मैंने कहा...मुझे नहीं कहना चाहिए था...."

"हाँ जो कहा वो कहना नहीं चाहिए था...और जो किया वो.....माहि मुझे तुम पर बहुत गुस्सा आ रहा था....तुम और कुनाल...ना जाने कबसे....जब तुम उसकी थी तब फिर भी मैं समझ सकता हूँ....पर जब तुम मेरे साथ थी तब भी...तुमने कभी बताया भी नहीं की तुम कुनाल से मिलती हो.....सिया और मेरा रिश्ता तो दोस्ती का ही था....सभी जानते है..बस class में assignment partner ....और late night studies friends ...खेर अब इन् सब बातों का कोई मतलब नहीं रह गया है...."

"पियूष...कुनाल और जो मैंने किया...वो बिलकुल गलत था....मैं कुनाल की बातों में आ गयी थी.....वो मुझसे एक बार मिलना चाहता था...और जब उसे तुम्हारे और सिया के बारे में बताया मैंने तो उसने मुझे तुम दोनों के खिलाफ ना जाने क्या क्या कहा....और मैंने भी कई बार अपने college में लोगो को करते देखा है....अक्सर लोग दोस्ती के नाम पर अपनी शारीरिक भूख मिटाते है...तो मुझे लगा कुनाल सही बोल रहा है....और फिर हमारे बीच भी कोई ऐसा रिश्ता नहीं था...तो मैं बहक गयी...कुनाल ने मुझे बहकाया......मगर अब मैं और कुनाल भी अलग हो गए है....उसने मुझे भी धोखा दिया है...मैं बहुत शर्मिंदा हूँ...तुम मुझसे अभी भी गुस्सा हो....मैं दिल से माफ़ी मांगती हूँ ..तुम कहो तो सिया से भी माफ़ी मांग लुंगी..बस एक बार मुझे माफ़ करदो...मुझे एक मौका दो...जैसा तुम कहोगे वैसा ही करुँगी....बस एक बार मेरी ज़िन्दगी में वापस आ जाओ..."

"माहि....अब इस सब की कोई ज़रुरत नहीं है....मैं तुम से सचमुच बहुत गुस्सा था....अपने ऊपर पर भी गुस्सा था..की क्यूँ मैं तुमको..तुम्हारी ज़रूरतों को समझ नहीं पाया....क्यूँ तुमको खुश नहीं रख पाया...सच बहुत रोया मैं....फिर सिया ने मुझे संभाला....हमारे बीच पहले शायद दोस्ती के सिया कुछ नहीं था..या था भी तो हमें उसका पता नहीं था....but thanks to you ...उस रात के बाद हम दोस्ती से आगे निकल गए है....हम एक दुसरे को और बेहतर समझने लगे है....अब वो मेरी प्रेरणा है...और मैं उसका होसला...और अब मैं तुम पर गुस्सा नहीं हूँ...बल्कि तुम्हारा शुक्रगुज़ार हूँ...उस रात के लिए भी और आज तुम यहाँ आई इसके लिए भी...क्यूंकि अगर ऐसा नहीं करती तो मैं सिया के लिए जो मेरे दिल है वो कभी समझ नहीं पाता...आज सिया और मेरी पहली date है...और आज मैं उसे मेरे जीवन में उसकी importance बताने वाला हूँ.." इतना बोलते ही मैं कमरे से बाहर निकल गया...और माहि वही खडी रह गयी...

हॉस्टल से निकलते वक़्त मेरे मन में सिया के लिए जो भी कुछ था..मैं उसे टटोलने लगा....हाँ माहि के साथ जो कुछ कुनाल ने किया मुझे उसका दुःख भी कहीं न कहीं हो रहा था...मगर सबसे ज्यादा मेरे और सिया के लिए ख़ुशी हो रही थी...अब मुझे मेरा और सिया का अनजाना सा  रिश्ता बिलकुल साफ़ साफ़ दिख रहा था....मैं सिया से शुरू से ही प्यार करता था..बस मुझे उसका एहसास नहीं था....उसकी तरफ से प्यार था या दोस्ती पता नहीं...पर मेरी तरफ से दोस्ती के साथ साथ उसके लिए फ़िक्र थी...भावेश को इसलिए मैं उस से दूर रखना चाहता था...क्यूंकि मैं खुद सिया के करीब रहना चाह्हता था..सबसे करीब..... अब सब कुछ समझ आ रहा था..की उस रात बस में क्या हो रहा था हमारे बीच..एक अनजान सी डोर थी...बस मेरे मन में माहि को खो देने का...और सिया की दोस्ती खो देने का डर था...पर सच कहूँ तो अब मुझे ऐसा लग रहा था की सिया के लिए अपने दिल में कबसे हो रही अपनी सारी भावनाओं को सिया से व्यक्त करने में मुझे कोई डर नहीं लगेगा.....आज नहीं तो कल मैं उसे अपने दिल की सभी भावनाए बता दूंगा....बस आज की date अच्छी जाए.....

Date मेरे प्लान के मुताबिक गयी..सिया को सब पसंद आया....वो बहुत खुश हुई....हम लोग सभी जगह गए जहाँ सिया जाना चाहती थी.....फिर तो जैसे हमारी आदत सी पड़ गयी........सिया के Date के ideas बदलते रहते थे......और धीरे धीरे filmi dates और practical होने लगे....lunch....dinner ...सड़क किनारे की चाट.... maggiee स्टाल ...बारिश में भीगने वाली dates.... अब हम अक्सर ऐसी dates पे जाते रहते और फिर एक दिन मैंने उसे propose कर दिया...जिसका जवाब सिया ने दो-चार दिन सोच समझ कर हाँ में दिया...

कॉलेज ख़त्म होने के बाद

हमारी placement हो गयी...हम अब नौकरी करने लगे...सिया अपने बिज़नस के लिए पैसे ज़मा कर रही थी.....और हमने एक दुसरे को अपनी सारी भावनाए बता दी थी....भविष्य में कब क्या क्या करने का प्लान है....नौकरी, बिज़नस, घर, शादी और बच्चे सब की विस्तार से चर्चा हो चुकी थी....और मैं तो बस माँ-पापा को सिया और मेरे बारे में बताने का मौका ढूंढ रहा था.....बस इंतज़ार कर रहा था की कब माँ मेरी शादी की बात छेड़े.....पर उनको भी पता नहीं क्या हो गया था.....अब उनको जैसे मेरी शादी की चिंता ही नहीं थी....या जैसे उन्होंने मेरी शादी की उम्मीद ही छोड़ दी थी...

फिर एक दिन हम सिया के घर गए.....मैं बहुत खुश हुआ...पर पता नहीं किसी ने मेरी ये ख़ुशी महसूस भी की या नहीं....सिया के घर मैं हर्ष से ज्यादा मेलजोल बढाने की कोशिश करने लगा.....सिया की माँ से भी तहजीब से बातें करता....सिया मुझे बाहर शहर घुमाने के बहाने घर से बाहर ले जाती...और हम यहाँ वहां घूम कर...कभी फिल्म देखने जाते.....हमने पहली बार kiss भी एक सिनेमा में की....सच मेरा तन बदन हिल गया था..झुनझुनाहट सी फ़ैल गयी उसके होठो की पहली छुहन से...करंट सा दौड़ गया तन-मन में........

ऐसे ही एक बार हम बाहर से आ रहे थे तो हमने सबको एक दुसरे का मुह मीठा करते हुए देखा...और जब हर्ष और पीहू ने हमें बताया...की अब से सिया पीहू की भाभी और मैं हर्ष का जीजू बन गया हूँ...जब हमें समझ में आया...की हमारे रिश्ते की बात पक्की हो गयी है...असल में सिया की माँ को सिया के लिए हमारे परिवार ने जो किया वो बहुत पसंद आया....उन्हें सिया के लिए हमारा परिवार ही ठीक लगा....जहाँ वो सबसे प्यार और सम्मान दोनों भरपूर पा सकेगी...और मेरे माँ-पापा तो कबसे मेरी शादी करना चाहते थे....और सिया को भी वो बेटी की तरह प्यार करते थे...उनके तो दोनों हाथो में लड्डू थे.....मैंने और सिया ने भी कुछ न बोलना ही ठीक समझा..जब सब कुछ अपने आप ही हो रहा था...तो फिर हमें ज्यादा कुछ करने की ज़रुरत भी नहीं थी...बस वो जैसा बोलते गए हम वैसे वैसे सर झुकाए सब मानते गए....फिर जल्द ही हमारी सगाई करा दी गयी....

और करीब एक साल बाद शादी हो गयी...आज सिया और मेरी पहली रात है.....सिया दुल्हन बनी मेरे कमरे में मेरा इंतज़ार कर रही है....मैं अंदर गया तो देखा वो घुघट ओडे सहमी सी बैठी है......ये पहली बार नहीं था की मैं और सिया एक कमरे में पूरी रात के लिए अकेले हो....पर पता नहीं क्यूँ एक अजीब सी हिचकिचात थी...हलाकि हमने इस रात के बारे खूब सारी बातें पहले भी की हुई थी....कैसे हम आगे बढेंगे...कब क्या कैसे करेंगे...सब कुछ...

कमरा फूलो की मोहक खुशबु से महक रहा था...मैं धीरे से सिया की ओर बढ़ा....धीरे से मैंने सिया का घुघट उठाया...उफ्फ्फ्फफ्फ्फ़ क्या लग रही थी वो....जयादा makeup नहीं किया था फिर भी गज़ब ढा रही थी..बिलकुल सादी मगर मेरे दिल में असरदार चोट करने के खाफी था.....मैंने धीरे से उसके गाल को चूमा...फिर माथे को फिर उसके आँखों को.....बिलकुल वैसे ही जैसा वो चाहती थी....उसने मुझे बताया था...वो बिलकुल फ़िल्मी सुहागरात चाहती है.....मैंने धीरे से उसके सभी गहने एक-एक करके उतारे.....फिर धीरे-धीरे हमने एक दुसरे को चूमा....फिर मैंने उसके बदन को चूमना शुरू किया.... और धीरे-धीरे मैं जब उसी कमर वाले तिल पर पंहुचा...तो मुझे वो बस वाली बात याद आ गयी....तभी सिया बोली...."आज खूब अच्छे से देख लो इस तिल को...करीब से....उस दिन जो देख नहीं पाए थे..."

पता था मुझे सिया को मुझे तंग करने में बहुत मज़ा आता था.....पर आज रात.....आज तो उसे चुप रहना था.....बिलकुल चुप जैसा की हमने बात की थी....उसे बस शर्माना था बिलकुल फ़िल्मी दुल्हन की तरह ....हाँ मैंने वो बस में तिल और भावेश वाली बातें सिया को सब बता दी थी.....मैंने सिया का जवाब देना ठीक नहीं समझा....और उसे एक लम्बी kiss देने के लिए उसके चेहरे की ओर बढ़ा.....तभी सिया ने बिस्तर के side table पे रखा दूध का गिलास उठा कर पिया....फिर आधा ख़त्म कर मेरी ओर बढ़ा दिया.....और बोली..."यह लो Complain  Boy"...."complain boy ...अभी यह complain boy ....बताता है तुमको रुको..."....मैंने गिलास उसकी जगह रख कर सिया को एक ज़ोरदार लम्बी kiss दी.....और जैसे ही मैंने kiss ख़त्म की...सिया बोली...."Hell with the फ़िल्मी सुहागरात plan ....अब यह complain girl तुमको बताती है kiss कैसे देते है..."....और वो एक दम से उठ कर मेरे ऊपर चढ़ गयी और जोर से जंगली बिल्ली की तरह ज़पट पड़ी......और मेरी लाइफ की सबसे लम्बी और मजेदार kiss दी.....और हमारी वो पहली रात एक बोरिंग फ़िल्मी सुहागरात एक रामांचित और रोमानी रात में में बदल गयी....



और ऐसी ही कुछ रातों और kisses का सिलसिला हमारे honeymoon पे भी चला.....और एक बार हमने थोड़ी सी rum भी ली....वो अलग बात है उस दिन हमने क्या क्या किया दोनों को ही नहीं याद...honeymoon पे मैंने सिया और कई अलग-अलग रूप देखे....बिलकुल जंगली, रोमानी, संवेदनात्मक, जिद करती प्यारी सी बच्ची, डांट लगाती मास्टरनी, शर्माती हुई छुईमुई, एकदम बिंदास बेफिक्र तूफानी लड़की, फ़िल्मी हिरोइन की नखरे करती महबूबा, पति की जेब का बिलकुल ख्याल न रखने वाली shopping freak पागल पत्नी, पति की गलती निकालती और पति को बेवकूफ समझने वाली समझदार बीवी   ....Wild, bold and beautiful ....

और हम शादी के 2 साल बाद भी बहुत खुश है.....और आज जब हम सोचते है तो यकीं ही नहीं होता.....किसने सोचा था.....की सिया...मेरी हो जाएगी...इतनी intelligent लड़की...मेरी बीवी....यकीं ही नहीं होता....जिस लड़की को में सपनो में देखा करता था...उस से भी अच्छी लड़की मेरी ज़िन्दगी बन जाएगी.......किसने सोचा था वो लड़की जो प्यार व्यार में विश्वास नहीं रखती वो मुझ जैसे के प्यार में पड़ जाएगी......मन में आ रहे ख्यालों को भी हमने नहीं समझा....न मैंने न सिया ने....कभी एक दुसरे के प्रति अजीब से लगाव को समझा...हम समझ ही नहीं पाए...की हम भले ही एक दुसरे को आकर्षित नहीं लगते हो लेकिन हम दोनों की रूह एक दुसरे से कहीं न कहीं जुडी हुई थी....बिना किसी उपरी आकर्षण के या फिर अनजान आकर्षण वाला वो कैसा रिश्ता था हमारा...हाँ आज उस रिश्ते को नाम मिल गया है....मगर पहले तो हम हमारे अनजाने से रिश्ते से अनजान से ही थे...हम एक दुसरे में दोस्त ढूंढते रहे.....दोस्ती को देखते रहे और प्यार को नहीं देख पाए.....ना जाने ऐसे ही कितने अनजाना से रिश्ते ऐसे ही बिना कोई मुकाम पाए बीच में ही संसार के भवर में डूब जाते है.....एक अजीब सी डोर दो दिल के बीच जो बार बार उन्हें एक दुसरे की ओर खिचती है वो डोर संसार के उपरी दिखावटी आकर्षण के खेल के जालों में उलझ कर टूट जाती है.....

आज भी सिया और मैं एक दुसरे के दोस्त है.....एक दुसरे की बातों को बिन बोले समझ जाते है...एक दुसरे को खूब प्यार देते है...लेकिन इस प्यार से हमारी दोस्ती में कोई फरक नहीं आया है...आज भी हम एक दुसरे को तंग करते है....एक दुसरे को एकदम से चोंका देते है.....gifts और dates से लेकर रोमांटिक टाइम....और passionate love से अपने प्यार को भी बढ़ाते रहते है ........ आज भी हमारे बीच अनजाना सा रिश्ता कायम है....

THE END
~'~hn~'~

Note : This story is only a Fiction, not real story, It is only for inspirational.

Monday, October 17, 2011

अनजाना सा रिश्ता (part 5)

सिया के घर कुछ दिनों बाद

सिया के घर जा कर जब मैंने माँ और पापा को वहां देखा तो मुझे पता चला की सिया के पापा और मेरे पापा के बहुत अच्छे दोस्त थे.....वो लोग कॉलेज में एक साथ पढते थे...और कई बार सिया के माँ-बाप हमारे घर और हम सभी भी उनके घर खाना खाने आते जाते रहे है.....मैं और सिया बहुत छोटे थे तभी सिया के पापा ने पुराना शहर छोड़ कर यहाँ दुसरे शहर आ बसे थे.....

यहाँ सिया और उसकी माँ का बुरा हाल था......दो-तीन दिन तो रोना धोना...खाना न खाना....दोनों एक दुसरे को देखते ही रो पड़ती थी...सिया का भाई छोटा था मगर जितना हो सकता सँभालने की कोशिश कर रहा था.....इसलिए मुझे और मेरे पापा को सब देखना पड़ रहा था.....क्यूंकि सिया के पापा का रिश्तेदार कहने को कोई नहीं था... यहाँ हमें बहुत दिन हो गए थे....और हम वापस जाने की तैयारी कर ही रहे थे....की सिया का भाई मेरे पास आया..."भैया...आप दीदी को अपने साथ ही ले जाओ...मैं उनको नहीं संभाल पाउँगा...माँ को तो जैसे तैसे मैं और पडोसी संभाल लेंगे..."

"हर्ष मैं वापस कॉलेज जा रहा हूँ....क्यूंकि कॉलेज में तो छुट्टियाँ भी हो गयी होंगी...हम लोगो को कहीं और जाना है....किसी और शहर.....शायद सुहाना कॉलेज जाये...उसके साथ सिया चली जाएगी..." मैंने हर्ष को मायूस कर दिया...

"सुहाना दीदी भी कॉलेज नहीं जा रही....मैंने उनसे पहले ही पुछा...." हर्ष ने कहा...."कोई बात नहीं बेटा...हम सिया को अपने साथ ले चलते है..." पापा ने हर्ष को कहा...वो कमरे के बाहर दरवाजे पे खड़े थे..."मगर पापा...हम तो...घर नहीं जा रहे.....तो सिया को अपने साथ ले जाना ठीक रहेगा.." मैंने पापा से पुछा...

"कोई बात नहीं पियूष....तुम्हारी मम्मी और मैं सिया को संभाल लेंगे....बहुत प्यारी बच्ची है....शायद हमारे साथ वहां जा के बच्ची का मन शांत हो जाये.....यहाँ तो बदहाल हो जाएगी...बार बार अपने पापा को याद करती रहेगी..बार बार उसे अपनी जिद....एक गलती लगेगी...उसने आगे पढने की जिद की थी...कोई गुनाह नहीं...वो अपने पापा की नारजगी को उनके मौत की ज़िम्मेदार समझ रही है...इस माहोल से बाहर जाएगी तो शायद सब भूल जाए...सही सोच की ज़रुरत है उसे..." पापा ने जैसे ही बात ख़त्म की वैसे ही हर्ष ने उनको थैंक्स कहा...

स्टेशन पे खड़े ट्रेन का इंतज़ार कर रहे थे....मैंने सिया की तरफ देखा....जैसे उसे कुछ होश ही नहीं था...वो कहाँ जा रही है...किसके साथ जा रही है.....तभी सिया की माँ ने मुझसे कहा..."बेटा ध्यान रखना उसका....डॉक्टर ने कहा है उसे इस माहोल से दूर ले जाने को...वरना उसे depression हो सकता है.....वो बचपन से ही ऐसी है....छोटी छोटी बातों पे मायूस हो जाती है....और सोचते सोचते.....गहरी नकारात्मक सोच में चली जाती है....." मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था...मैं ऐसी सिया को नहीं जानता....मैं तो एक चंचल और आत्मविश्वास से भरी सिया को ही जनता हूँ...हमेशा खुश रहने वाली....बिंदास कभी भी कुछ भी बोल देने वाली....मुझे tease करने वाली....पिछले दिनों सिया का अलग ही रूप देखने को मिला मुझे.....बिंदास गर्ल से मायूस सदमे में सहमी सिया.....खुद को सबसे काटके अलग रखने वाली सिया.....अपने अंदर ही अंदर गम में डूब जाने वाली सिया...मुझे अपनी सिया वापस चाहिए थी....वो ही सिया जो उस ट्रिप से पहले थी....मेरी दोस्त...मेरी काल्पनिक दुनिया मेरी गर्लफ्रेंड.....

हम ट्रेन में बैठ गए...और सबने हमें विदा किया...ट्रेन चलने लगी.....सिया को अचानक पता नहीं क्या हुआ..वो अपनी सीट से उठ कर वापस ट्रेन के दरवाजे की ओर भागने के लिए लपकी....मैंने उसको पकड़ लिया....वो जोर जोर से रो रही थी...और बोल रही थी.."नहीं पापा..मुझे नहीं जाना..मैं यहीं रहूंगी आपके पास हमेशा...यहीं...मुझे नहीं पढना आगे..नहीं करना कोई बिज़नस...." बार बार बोलती जा रही थी...मैंने उसे झटके से ट्रेन की बर्थ पर बिठाया....पापा ने उसके मुह पे पानी की छीटें दी....माँ ने संभाला...अपने अंचल से मुह पुछा...और अपनी गोद में उसका सर रखा...प्यार से सहलाया.....जब जाके वो शांत हुई और हमारी जान में जान आई...

करीब 1 दिन के बाद हम अपनी मंजिल तक पहुचे...माहि, पीहू और माहि के माँ-बाप हमारा स्टेशन पर ही इंतज़ार कर रही थी.....वो लोग एक दिन पहले ही यहाँ आ गए थे....माहि ने मेरा गिफ्ट किया हुआ टॉप और स्कर्ट पहनी हुई थी...उसने हमेशा की तरह थोडा makeup भी किया हुआ था..... मैं माहि को इतने दिनों बाद देख कर बहुत खुश हुआ......माँ और पापा ट्रेन से सामान उतारने लगे.....मैं उनकी मदद करने लगा..तो पापा ने कहा..."तुम सिया को संभालो..."....मैं सिया को सँभालते हुए ट्रेन से उतारा...माहि ने माँ-पापा के पैर छूए और मेरी ओर देखने लगी.....लेकिन सिया को मेरी बाँहों में देख उसके चेहरे पे मायूसी सी छा गयी....और कई सवाल भी....माँ-पापा उसके सवालों को समझ गए और सभी कुछ विस्तार से बताने लगे.....जब तक मैंने सिया को cab में बिठाया....फिर मैंने और पीहू ने सामान रखा....और हम सब बैठ कर होटल की ओर चल दिए......

रात के खाने के बाद मैं माहि के कमरे में गया..."Oo माहि...मत पूछो मैंने तुमको कितना miss किया.....मैं तुमको देख कर कितना खुश हूँ....मिलके कितना खुश हूँ.....एक बार गले लगा लो यार..." मैं माहि की तरफ बढ़ा...."रहने दो मुझे पता है कितना याद किया मुझे तुमने..इतने दिनों से ना फ़ोन न कोई sms .....मैं ही पागल हूँ जो तुमको फ़ोन करती रहती हूँ...सोचा कुछ दिन हम सब पूरा परिवार साथ रहेगा....लेकिन नहीं उस सिया को भी साथ ले आये...."...माहि ने शिकायत की...."पर यार पापा ने बताया तो तुमको....वहां क्या माहोल था....कैसे फ़ोन करता....वहां सब शौक सभा में थे...वहां से कैसे...और सिया की हालत बताई तो तुम्हे..और तुम देख भी रही हो...कैसे मुरझा सी गयी है..." मैंने कहा..."पियूष हम यहाँ मौज मस्ती करने आये है..एक पारिवारिक छुट्टियाँ मनाने...अब उसकी मायूस सूरत देख कर हम क्या मौज मस्ती कर पाएंगे....मेरे माँ-पापा को भी अच्छा नहीं लगा तुम लोगो का उसे साथ में लाना..हमने क्या क्या प्लान बनाये थे...सब किरकिरा कर दिया..."..

"अच्छा...क्या क्या प्लान बताओ तो....मैं भी तो सुनु... "मैंने माहि की कमर में अपनी बाहें डाल दी और उसे कस के पकड़ के पुछा...तो वो खिलखिला के हंस दी.....तभी कमरे के बाहर दस्तक हुई...."भैया नाश्ता तैयार है....आ जाइये माँ-पापा के कमरे में..." पीहू ने बाहर से आवाज़ लगा के बताना ठीक समझा...अच्छा हुआ वो सीधा अंदर आके नहीं बोली वरना हमें ऐसे देख लेती तो..मैं तो वहीँ पानी पानी हो जाता....

दोपहर के खाने तक सभी ने अपनी थकन उतार ली थी.....और सभी माँ-पापा के कमरे लंच करने आये...सिया भी बेहतर लग रही थी....वो पीहू के साथ उसके कमरे में रही थी....ज़रूर पीहू की मीठी मीठी बातों का असर हुआ होगा उस पर....पीहू ने उसे अच्छे से संभाल लिया था.....अब सिया हाँ और ना का जवाब भी दे रही थी....सिया माहि से मिली भी...जैसा वो हमेशा से माहि से मिलना चाहती थी.....मैं सिया से पूछना चाहता था की उसे माहि कैसी लगी.....जब सिया सबसे अलग होके एक खिड़की के बाहर देख रही थी तो मैंने मौका देखते ही उसकी तरफ जा के उस से पुछा..."तो..कैसी लगी मेरी दूसरी girlfriend को मेरी पहली वाली girlfriend .." सिया कुछ नहीं बोली बस मेरी ओर देखती रही...."अरे मैं पूछ रहा हम तुमको माहि कैसी लगी...है ना मेरी पसंद लाजवाब" मैंने फिर से पुछा......"हम्म्म्म.....अच्छी है....तुम्हारे टाइप की लड़की है..." सिया का इतना ठंडा जवाब मुझे अच्छा नहीं लगा...मगर मैं समझ सकता हूँ वो अभी थोड़ी उदास है....तो मैंने अपनी बातों में लगाने के लिए बोला.."कितनी अजीब बात है ना हमारे माँ-बाप भी एक दुसरे को पहले से जानते थे...इसका मतलब हम पहले भी मिल चुके है बचपन में...शायद एक साथ खेले भी हो...किसे पता था हम एक बार फिर मिलेंगे इतने सालों बाद किसी कॉलेज में" मैंने सबकी तरफ देखते हुए अपना वाक्य पूरा किया....तो मेरी नज़र माहि पे पड़ी जो इसी तरफ देख रही थी.....मैं उसको देख कर मुस्कुरा दिया....मगर माहि ने मुझ से मुह फेर कर मेरी माँ की ओर कर लिया...

सिया ने हमारी इन् हरकतों को शायद देख लिया "मुझे लगता है हमें सबके साथ बैठना चाहिए.." सिया बोलती हुई सबकी ओर चल दी....अजीब है...क्या ये मुझसे नाराज़ है...या फिर मैंने कुछ गलत बोल दिया.....शायद माँ-बाप वाली बात से उसे उसके पापा की याद आ गयी...मैं क्यूँ उसे खुश नहीं कर पा रहा हूँ...पहले तो वो मेरी हर बात पर हंस देती थी...शायद मुझे कोई joke ही बोलना चाहिए था.....

सभी लोग ज्यादा से ज्यादा कोशिश कर रहे थे की सिया को उसके पापा की याद ना आ जाए.....मेरे माँ-पापा ने सबको पहले ही बोल दिया था की सिया के पापा या उसके परिवार के बारे में कोई बात नहीं करेगा...यहाँ वहां की बातें हो रही थी......मेरी माँ मेरी और माहि की शादी के बारे बात कर रही थी....कब क्या...और क्या-क्या कैसे होगा...शादी की तारीक.....जैसे माँ का यह पसंदीदा विषय था बात करने का...पर इस बार मुझे बुरा नहीं लग रहा था...क्यूंकि मेरी शादी माहि से हो रही थी....बिलकुल मेरे मन मुताबिक और मेरे ही कहने पे होगी....जब मैं चाहुगा...कोई जल्दी नहीं....."तो बेटा बस एक साल ही रह गया है पढाई का फिर तो नौकरी लग जाएगी...उसके बाद हम शादी की तारिख निकाल ले ना कोई दिक्कत तो नहीं...".....माहि के पापा ने मुझसे पुछा....मगर जवाब झट से मेरी माँ ने दिया..."हाँ हाँ बिलकुल नौकरी लगते ही शादी की तैयारी शुरू कर लेना भाई साहेब....इसमें पूछने की क्या बात है...माहि को भी तो जल्दी होगी...क्यूँ माहि ठीक है ना...तुम तो नयी नयी ट्रेंड की designer dresses पहनोगी हैं ना"...

"मगर माँ.....नौकरी लगते ही......माँ मुझे थोडा वक़्त और चाहिए होगा....नौकरी लगने के कुछ साल तो....या फिर कम से कम एक साल तो चाहिए होगा...ताकि पक्की नौकरी होने के बाद ही शादी हो...."मैं माँ से बोला...
"श्श्शश्श्श...मैं अब तेरी एक नहीं सुनने वाली....तुने MBA करने के लिए टाइम माँगा था...सो हमने दिया..अब कोई बहाना नहीं...नौकरी तो एक न एक दिन पक्की हो ही जाएगी...." माँ की दादागिरी फिर शुरू हो गयी थी....और यहाँ वो अकेली नहीं थी.....माहि के माँ-पापा भी थे...उनका साथ देने को....इसलिए मैंने और पापा ने चुप रहना ही ठीक समझा...कुछ देर बातें करने के बाद सब बड़ों को छोड़ कर सभी अपने कमरों में चले गए.....

बाकी का दिन माहि और मैंने एक साथ उसके कमरे में बिताया...खूब सारी बातें की...और रात के खाने के बाद मैं अपने कमरे में चला गया...और थोड़ी देर बाद मेरे कमरे के दरवाजे पे दस्तक हुई....मैंने दरवाजा खोला तो माहि खड़ी थी.....माहि कमरे में अंदर पहुँच कर बोली.."तुम शादी से इतना डरते क्यूँ हो"... "नहीं ऐसा कुछ नहीं है...शादी से क्या डरना..बल्कि शादी के बाद तो तुम हमेशा के लिए मेरी हो जाओगी....बस मैं अभी जिम्मेदारियां नहीं संभाल सकता...पहले कुछ बन जाऊ....अच्छा ख़ासा कमाने लग जाऊ.....की तुमको खुश रख सकूँ...बस फिर हम शादी कर लेंगे...." उसे अपनी बाँहों में भरते हुए मैंने कहा...

"पहले ठीक था...हम एक दुसरे को अच्छे से नहीं जानते थे...फिर सगाई के बाद हम एक दुसरे को और अच्छे से जान चुके है...हाँ बस एक ही पर्दा रह गया है हमारे बीच....जिसे भी तुम नहीं तोडना चाहते....बल्कि मुझे ऐतराज़ होना चाहिए...मुझे लगता है हमें रिश्ते के अगले पड़ाव की ओर जाना चाहिए....तुम एक-दो साल और क्यूँ मुझसे दूर रहना चाहते हो...मुझसे अभी भी प्यार तो करते हो ना"

"क्या बोले जा रही हो...तुमसे प्यार किया है हमेशा...भूलो मत तुम मेरा पहला प्यार हो...." हाँ मैंने माहि को सब बता दिया था..कैसे मैं उसे छुप-छुप कर देखा करता था...कुनाल की खिड़की से...

"हाँ वो पहला पहला प्यार जो कभी किसी को नहीं मिलता...पियूष मैं अब और इंतज़ार नहीं कर सकती..." माहि मुझे बिस्तर पर धक्का दे कर बोली...और खुद भी मुझ पर गिर गयी...."मैं जानता हूँ इंतज़ार तो मैं भी नहीं कर सकता पर..क्या करू...मैंने हमेशा से सोचा है एक अच्छी नौकरी ..फिर अच्छी कमाई..फिर ही अच्छी बीवी और अच्छा सा घर...और अच्छे से बच्चे...समझा करो...practical होना ही आजकल की मांग है...और जिस परदे की बात कर रही हो......वो शादी के बाद ही खुले तो अच्छा है...जितना इतेज़ार करेंगे...उतना ही फल मीठा मिलेगा.....शादी के बाद हम उतना ही खुश रह पाएंगे...एक दुसरे की नज़रों में उतना ही सम्मान और आदर-सत्कार बना रहेगा...शादी से पहले हमें अपनी प्रतिष्ठा नहीं खोनी चाहिए..."......

"ठीक है Mr practical....इतना lecture मत दो....जैसा तुम कहो...मेरी तो तुम सुनने वाले हो नहीं....मैं कोशिश भी क्यूँ कर रही हूँ"

"मुझे लगता है अब तुम्हे अपने कमरे में जाना चाहिए..रात हो गयी है..और सुबह हमें जल्दी उठ कर घुमने भी तो जाना है सबको साथ लेकर...."....
"हाँ हाँ रात हो गयी है मुझे पता है....चली जाउंगी.....if you don't  mind मैं तुम्हारा restroom use कर लूं...."
"हाँ जानू..इसमें पूछने की क्या ज़रुरत है...जो कुछ है सब तुम्हारा ही तो है..." और वो बाथरूम में चली गयी...थोड़ी देर बाद उसका मोबाइल बजा..उसमें कोई SMS आया था....."जानू तुम्हारा फ़ोन...कोई SMS है.."....मैं उसका मोबाइल उठा ही रहा था की गलती से मेरी उंगली उस पर लग गयी और SMS खुल गया.....मैं पढना नहीं चाहता था....पर कुनाल का नाम देख कर मैं रुक गया...और पढने लगा..

"तुम कहो तो मैं आ जाता हूँ....दिन में तुम उसके साथ घूमना...रात को मेरी बाँहों में झुलना...जैसे सालों से झूलती आ रही हो...तुम्हारे साथ बिताई रातें मैं कभी नहीं भूलूंगा न तुमको कभी भूलने दूंगा....तुम्हारे साथ बिताया एक एक पल....एक एक रात....उफ्फ्फ्फ़....मैं हर वक़्त आने वाली उन् रातों के बारे में सोचता रहता हूँ जब तुम फिर होगी मेरी बाँहों में ....तुम बस बताओ या इशारा करो  कब और कहाँ..."


to be continue....
~'~hn~'~

Note : This story is only a Fiction, not real story, It is only for inspirational.

Sunday, October 16, 2011

अनजाना सा रिश्ता (part 4)

अगले दिन कपिल ने बाहर से नाश्ता मंगवा लिया.....और सबको बुला कर नाश्ता करवाया.....मैंने सिया को ढूंढना चाहा पर नहीं मिली....सुहाना से पूछने पे पता चला की सिया अपने कमरे से बाहर ही नहीं आई....मैं नाश्ता ले कर उसके पास जाना चाहता था...पर पता नहीं किस वजह से नहीं जाने का फैसला किया...माहि को फ़ोन किया और उसे बताया की मुझे उसकी कितनी याद आ रही है..रास्ते भर वो मेरे खयालो में छाई रही...माहि का मूड भी बहुत अच्छा था...वो भी मुझे याद कर रही थी...पिछली कुछ मुलाकातें और हमारी प्यार भरी बातें...फिर उसने सिया के बारे में पुछा...की "वो भी खूब मस्ती कर रही होगी...हमेशा पढाई करने वाली लड़की...आज तो मज़े और मस्ती के मूड होगी..."

माहि की बातों से मैं कल की बात को भूलना चाहता था....पर उसने सिया का ज़िक्र कर सब किरकिरा कर दिया...खेर मैंने फिर विषय बदल कर उसके workshop के बारे में पुछा....करीब 10-15 मिनट और बात करने के बाद मैं खुद को ठीक महसूस कर रहा था....वापस सब के पास आया....तो सब हॉल में पहुँच चुके थे....music की तेज़ आवाज़..सब लोगो का शोर शराबा...soft और hard  music और drinks....सब लोग मस्ती कर रहे थे...मैंने देखा सुहाना और अर्जुन एक तरफ बैठे इश्क फरमा रहे थे....कोई भी देख के बता सकता था की रात भर दोनों ने एक दुसरे की बाँहों में बितायी होगी....

"सुहाना सिया कहाँ है?" मैंने न चाहते हुए भी उन दोनों को disturb कर दिया..
"सिया तो कमरे में ही है....रात भर उसके सर में दर्द था..सोयी ही नहीं पायी...उसे नयी जगह नींद नहीं आती...न खुद सोयी न मुझे सोने दिया...मैंने उसे बोला है जैसे ही उसे ठीक लगे बाहर आ जाये....देखो आती ही होगी.." सुहाना ने कहा और फिर अर्जुन को प्यार भरी नज़रों से देखने लगी.....
मैं सिया के कमरे की और जा ही रहा था की वो खुद सामने से आती हुई दिखी.....और आते ही बोली..."हे पियूष...लो मेरे बिना पार्टी शुरू भी हो गयी...सॉरी मुझे देर हो गयी..सर दर्द कर रहा था...रात को नींद नहीं आई....सर दर्द की गोली लेने के बाद ही सुबह ही थोड़ी नींद आई थी....अभी उठी तो ठीक लगा इसलिए आ गयी"....मैं उस से पूछना चाहता था...की वो रात भर क्यूँ नहीं सो पाई...नयी जगह होने की वजह से या फिर जो बस में हुआ उसकी वजह से....फिर सोचा शायद वो खुद ही बात करना चाहे...

मगर थोड़ी देर बाद तक भी उसने उस बारे में कोई बात नहीं की...वो बिलकुल पहले जैसे ही बात कर रही थी...जैसे हम पहले थे वैसे ही....जैसे जो हुआ उस से उसे कोई फरक नहीं पड़ा....जब उसे कोई फरक नहीं पड़ा तो मुझे भी सब भूल जाना चाहिए.....

"दोस्तों हम लोग अब एक खेल खेलने जा रहे है truth or dare....जैसा की सबको इसके rules पता ही है....पर हमने थोडा सा change किया है....इसमें जिसकी भी बारी आयेगी उसे truth और dare दोनों ही एक साथ करने पड़ेगे...no truth या dare ...बल्कि truth के साथ-साथ एक dare भी..." कपिल ने announce किया...
और खेल शुरू हो गया...एक एक कर सबकी बारी आने लगी...मुझे भी मज़ा आने लगा....सुहाना की बारी आई तो उसे अपने बारे में एक सच बताने को कहा गया....."मैं अर्जुन से बहुत बहुत प्यार करती हूँ....बेशक वो मुझे internet पे मिला था...पर अब वो मेरी ज़िन्दगी का हिस्सा है और मैं अपना future उसी के साथ देखती हूँ..." और फिर उसे अर्जुन को kiss करने को कहा गया...तो उसने अर्जुन के गालो पे एक kiss दी....

फिर थोड़ी देर बाद सिया की बारी भी आ गयी....जिस से भावेश ने पुछा..."क्या तुम्हारा कोई boyfriend है....है तो कौन...और अगर नहीं है तो क्यूँ नहीं है...."...सच तो मैं सिया से पूछना चाहता था...कल के बारे में मगर सबके सामने नहीं अकेले में.."नहीं मेरा कोई boyfriend नहीं है...क्यूंकि आज तक मुझे किसी ने propose ही नहीं किया....किसी ने नहीं पुछा की क्या तुम मेरे साथ date पे चलोगी...." सिया का ये जवाब सुन कर पता नहीं क्यूँ मुझे विश्वास नहीं हुआ की वो सच बोल रही है....उसने मुझे तो ये बताया था की वो प्यार व्यार में विश्वास नहीं करती.....लेकिन कल जो हुआ उसके बाद तो जैसे जो उसने कहा वोही सच लग रहा था...शायद वो प्यार में बहुत विश्वास रखती हो..बस किसी ने उसकी खूबसूरती को देखा ही न हो....सिया को एक drink लेने को कहा गया...क्यूंकि सभी जानते थे की वो नहीं पीती थी....सिया ने एक छोटा सा पेग लगा कर dare भी पूरा किया...
और फिर मेरी बारी भी आ ही गयी...मुझसे सिया ने पुछा "क्या तुम कभी किसी लड़की के साथ...मेरा मतलब...अपनी किसी girlfriend के साथ ही....sexuaa......." "नहीं.....कभी नहीं..." सिया के आगे बोलने से पहले ही मैं जवाब दे दिया...सिया ने मुझसे ऐसा कुछ पुछा मुझे यकीं ही नहीं हो रहा था....शायद उसे चढ़ गयी थी...क्यूंकि वो दो चार पेग और लगा चुकी थी....और फिर मुझे भावेश ने dare दिया...."तुमको किसी लड़की के बदन पर एक तिल ढूँढना है और वहां उसे kiss करना है" भावेश किस तिल की तरफ इशारा कर रहा था मैं जानता था...बल्कि वहां सिर्फ वो और मैं ही जानते थे की वो किस लड़की के बदन पे और किस तिल की बात कर रहा है....एक पल तो लगा अभी उसे दो चार लगा दूं...पर फिर इधर उधर देखा और सुहाना की और बड़ा...उसका हाथ हाथो में लिया और उसके हाथो को चूम दिया...उसके हाथो पे एक तिल था....सुहाना "ओह्ह्ह....wow !!!! thanks ...हिहिहिहिहिही?"

खेल आगे बढ़ा और भावेश की बारी आई...उस से मैंने ही पुछा "भावेश हमने कभी तुम्हे लड़की के साथ नहीं देखा...मेरा मतलब सब ठीक तो है ना....तुम गे तो नहीं हो...just verifying..." आखिर इतनी मुश्किल से हाथ लगा बदला लेने का मौका मैं कैसे छोड़ सकता था....उसने भी तो तिल की बात से मुझे सबके सामने परेशान किया था...अब मेरी बारी थी उसके पसीने निकालने की...

"नहीं...नहीं...सब ठीक है...सब कुछ ठीक है...i am very much straight ....."सकपकाते हुए भावेश ने बोला....मुझे उसे इस तरह देख पता नहीं क्यूँ बहुत मज़ा आया.....फिर कपिल बोला.."अच्छा....तो फिर dare में तुमको किसी लड़की को propose करो....और अगर उसने हाँ बोल दिया तो किस भी करके दिखाओ"

भावेश इधर उधर देखने लगा...और अचानक सिया पर जाके उसकी नज़र टिक गयी...और वो आगे बढने लगा....मुझे लगा जैसे मैंने उसके लिए कुआ खोदा और मैं खुद उसी में गिर गया....पता नहीं क्यूँ उसे सिया की ओर बढते हुए देखना मुझे अच्छा नहीं लग रहा था....

उसने धीरे से सिया का हाथ पकड़ा और पुछा.."सिया तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो.....क्या तुम मेरे साथ एक Date पे चलोगी....." मुझे लगा था भावेश नहीं कर पायेगा...पर उसने सच में बोल दिया...हाँ उसे पसीने बहुत आ रहे थे.....मैं मन ही मन भगवान से प्राथना करने लगा की सिया गलती से भी हाँ न बोल दे...
"हाँ....date पे....हाँ....चलो....मैं तो कबसे date पे जाना चाहती हूँ..." सिया ने यह कह कर सब लोगो की धड़कने बड़ा दी....सिया जो पहले से ही होश में नहीं थी.....वो भावेश को आगे बढने से भी नहीं रोकेगी...

भावेश सिया के और करीब आने लगा.....उसने सिया के चहरे के आगे अपना चेहरा रखा....दोनों हाथो से सिया के चेहरे को पकड़ा....मैं हडबडाते हुए सिया की ओर बढ़ा और उसका हाथ पकड़ के अपनी ओर खीच कर कहा..."भावेश...सिया होश में नहीं है...so please ...no kiss viss......"

"i hope अब कोई doubt नहीं है तुम्हारे मन में मुझे ले के..." भावेश ने मुझे घूरते हुए देखा और कहा....
"हाँ ठीक है.....मुझे माफ़ करदो...मुझे तुमसे ऐसे सवाल नहीं करना चाहिये था.." मुझे लगा मैं अभी भी उसी कुए में गोते खा रहा हूँ...

"चलो अब खेल को आगे बढ़ाते है" सुहाना बोली...और खेल फिर से शुरू हो गया....फिर अर्जुन की भी बारी आई उसके बाद खनक की और फिर कपिल की बारी आई...तो उस से पुछा गया.....की वो अपने पापा से नफरत क्यूँ करता है....और जवाब में कपिल रो दिया..."नफरत नहीं मैं उनसे बहुत प्यार करता हूँ..पर उनके पास मेरे लिए समय ही नहीं हमेशा business meetings....नया venture ....नया goal ..... profit ..loss ..मैं पापा से नहीं पैसो से नफरत करता हूँ तभी मैं इन् पैसो को खुद लूटता हूँ की कभी तो पापा के पैसो का पीछा छोड़ देंगे और उनको उनका प्यारा सा कपिल दिखेगा...एक दिन ऐसा ज़रूर होगा...उनको पैसो के ढेर में बैठा, उनके पैसो को लुटाता उनका बेटा ज़रूर नज़र आयेगा..." कपिल की बाते सुन सभी की आँखों में पानी आ गया..और जो लोग उसे show off करने वाला सोचते थे...उनको भी कपिल की अंतरात्मा नज़र आ गयी.....और dare में उसे अपने पापा को फ़ोन करने को कहा गया....उस से कहा गया की वो खुद अपने पापा को फ़ोन कर उनको अपने बर्थडे की याद दिलाये...कपिल फ़ोन करना नहीं चाहता था..पर सबके कहने पर उसने किया....और अपने पापा को अपने साथ बिताये सुन्हेरे पल याद कराये...उसके पापा ने उसे आशीर्वाद दिया....और वादा किया की अगले हफ्ते वो उसे मिलने ज़रूर आएंगे..

खेल ख़त्म हो गया...और सब फिर पार्टी का मज़ा लेने लगे.....फिर वापस सारे रास्ते सिया मेरे कंधे का सहारा लिया.....भावेश ने मुझसे बात करना छोड़ दिया....न तो रास्ते भर बात की और ना ही कॉलेज वापस आके हॉस्टल में भी.....और अगले दिन कमरे से अपना सारा सामान उठा के कपिल के कमरे में चला गया...मैं लगातार माफ़ी मांगता रहा.....सिया को पार्टी में क्या हुआ जैसे ही पता चला....वो मुझे thanks बोलने आई...

"thanks पियूष तुम अगर मुझे नहीं सँभालते तो पता नहीं क्या हो जाता...मैंने कभी नहीं पी...न ही मैं कभी पीती....खेल खेल में भी नहीं....वो तो बस में जो हुआ शायद उस वजह से...मुझे लगता है पियूष...हमको अब एक दुसरे से थोड़ी दूरी बनानी चाहिए...मैं तुम्हारे और माहि के रिश्ते के बीच नहीं आना चाहती.....मेरे लिए वैसे भी प्यार का कोई मतलब नहीं है.....और मैं हमारी दोस्ती भी नहीं खोना चाहती...इसलिए अब हम बस क्लास में ही मिला करेंगे..और ज्यादा से ज्यादा अलग अलग पढाई किया करेंगे...वैसे भी परीक्षाएं नजदीक आ रही है..." मुझे बोलने का मौका दिए बिना वोह बोले चली गयी....मैं उसके बिना पढने की सोच भी नहीं सकता...अपनी बात ख़त्म करते ही वो सुहाना के साथ library चली गयी...

परीक्षाएं ख़त्म होने के बाद

परीक्षाओं के बाद मैं अपने घर जाने की तैयारी कर रहा था...मुझे घर से माँ और पापा को लेके माहि के प्लान किये हुए ट्रिप पे जो निकलना था...की अचानक...."पियूष....पियूष...." सुहाना आवाज़ लगाती हुई मेरे कमरे की तरफ दौड़ी चली आ रही थी..."पियूष...सिया....जल्दी चलो..." मैं बिना सोचे समझे उसके साथ चल दिया...girls hostel में लडको का आना बिल्कुल मना था.....सुहाना के जोर देने पे चौकीदार मान गया...और मुझे सुहाना के साथ अंदर जाने दिया..मैं पहली बार सिया के कमरे के अंदर जा रहा था......

"क्या हुआ सिया को ?...." मैंने सुहाना से रास्ते में ही पुछा...तो उसने बताया..सिया के घर से फ़ोन आया था...उसके पापा का accident हो गया है....और उनकी हालत बहुत ख़राब है....सिया बेहोश हो गयी है...अब इस हालत में हॉस्टल वाले उसे घर नहीं जाने देंगे...तो मुझे और सुहाना को सिया के साथ जाना होगा.... "सिया के  पापा.....सिया ने कभी मुझे अपने पापा के बारे में नहीं बताया...हमेशा माँ और अपने भाइयों के बारे में भी बात किया करती थी..." मैं मन ही मन सोच ही रहा था...की सुहाना बोली.."सिया तो अपने पापा से बहुत प्यार करती थी....पापा की लाडली थी वो...पर जब उसने इस कॉलेज में दाखिला लिया तबसे उसकी और उसके पापा की बोलचाल बंद थी...उसके पापा उसे हॉस्टल में रहने से मना करते थे...वो उसे घरके आस पास ही पढने को बोलते थे..पर सिया को तो अपना बिज़नस खोलना है...इसलिए यह डिग्री उसके लिए बहुत ज़रूरी है....उसके पापा की जिद से भी ज़रूरी...चाहे उसे उसके प्यारे पापा और घर वालो से दूर रह कर ही पढना पड़े....वो सबके लिए तैयार थी....उसने सोचा था...वो जब कुछ बन के , अपना बिज़नस खोलने के बाद..कुछ कर दिखने के बाद पापा के पास जाएगी तो उसके पापा..उस पर गर्व करेंगे...उसे प्यार से गले लगा लेंगे...सब नाराज़गी भूल जायेंगे.." सुहाना जो कुछ बोल रही मैं उसे समझने की कोशिश कर रहा था....

थोड़ी देर बाद सिया को होश आ गया था...पर उसने किसी से भी एक शब्द भी नहीं बोला...घर से फ़ोन आया तो मैंने उनको बता दिया मैं कुछ दिनों बाद ही आ पाउँगा...और माहि का फ़ोन आया तो उस को भी ट्रिप को कुछ दिन आगे बढाने को कहा....

अगले दिन मैं सुहाना और सिया को लेके सिया के घर की और चल दिया...सुहाना ने अर्जुन से बोल के ट्रेन की tickets करवा ली थी...


to be continue....
~'~hn~'~

Note : This story is only a Fiction, not real story, It is only for inspirational.

Saturday, October 15, 2011

अनजाना सा रिश्ता (part 3)

Next Weekend

सिया और मैं institute  के हरे भरे मैदान में बैठे अपने नोट्स arrange करते करते बाते कर रहे थे....
"तो तुम्हारी और माहि की पिछली डेट भी हमेशा की तरह अच्छी ही गयी.....क्यूँ ?" सिया ने मुझसे पुछा..
"ह्म्म्म....वो जो कपडे पहने थे ना उसी के गिफ्ट किये हुए थे...सो उन्हें मुझे पहने देखा तो बहुत खुश हुई....मैं भी खुश ही था....पर...." कहते कहते मैं अचानक रुक गया...मन की आवाज़ ने मुझे ऐसा करने से रोक लिया..."जैसा मैं सोच रहा हूँ ऐसा शायद हो ही नहीं....शायद माहि सच कह रही हो.....जैसे मैं पढाई में busy रहता हूँ .....वो भी कहीं busy रहती हो...वो मुझे जानभूझ कर ignore क्यूँ करेगी..."

"पर क्या ....कुछ हुआ क्या...कोई प्रॉब्लम..." सिया ने अपनी आँखों को और बड़ा करके मेरी तरफ देखते हुए पुछा..
"कुछ नहीं....मेरी छोड़ो तुम बताओ तुम भी तो पार्टी में गयी थी सजधज कर....क्या हुआ पार्टी में"....मेरी सजधज शब्द को जोर देके कहने पे सिया ने एक पल मुझे घूरा....फिर बोली.."नहीं..ऐसा कुछ खास नहीं....मेरी cousin को लगता है मुझे अपने लिए एक boyfriend ढूंढ लेना चाहिए....उसने कई लड़कों से भी मुझे मिलवाया...पर उसे क्या पता मैं किसी भी लड़के की सपनो आने वाली लड़की नहीं हूँ......मुझे कोनसा लड़का अपनी गर्ल फ्रेंड बनाएगा...खेर छोड़ो...मुझे वैसे भी ये प्यार व्यार की कहानियां नहीं जचती...."

सिया की यह बात मुझे भावेश की याद दिला गयी.....और मैंने फट से बोला.."नहीं....ऐसा नहीं है....सिया तुमको किसने कहा की कोई तुमको अपनी गर्ल फ्रेंड बनाना नहीं चाहेगा...अरे तुम स्मार्ट हो...तुम intelligent हो...देखो हर लड़के की पसंद अलग अलग होती है..हर कोई दुबली-पतली, सुंदर, गोरी, सजधज के रहने वाली लड़की को पसंद नहीं करता...हर लड़के के लिए उसकी टाइप की लड़की अलग होती है...कोई simple ...तो कोई नखरे वाली...तो कोई खामोश...तो कोई चंचल लड़की को पसंद करता है...तो तुम ऐसा बिलकुल भी मत सोचा..कभी न कभी कोई तुमको भी चाहेगा....बस इंतज़ार करो उसका...जो तुम्हारे दिल के तारों को छेड जाए..."

"ओह्ह..philosopher जी....बस कीजिये....मुझे भी पता है...कोई न कोई हर किसी के लिए बना है....और वो जल्द ही मेरी ज़िन्दगी में आने वाला है....और न भी आया तो मेरी माँ है ना उसे मेरी ज़िन्दगी में लाने के लिए..कोई अच्छा लड़का ढूंढ ही लेगी मेरे लिए...." एक सांस भरते हुए सिया बोली....
"अपनी माँ क्यूँ कष्ट देती हो..मैं हूँ न...मैं ढूंढ दूंगा..."
"अच्छा तुमको मेरी पसंद पता भी है..??"
"हम्म....तो बताओ कैसा लड़का पसंद है....मेरे जैसा handsome चलेगा या फिर कोई simple भोंधू टाइप"

"shut-up you ..." मुझ पर जोर से नोट्स मरती हुई सिया बोली....मैं साफ़ उसके गालों पे आई लाली को देख सकता था...पहली बार सिया को ऐसे देख रहा था मैं....सच कितनी भोली और मासूम लग रही थी...अपने रोबदार, समझदार और चंचल वाले व्यक्तित्व से बिलकुल अलग...वो अचानक से उठ गयी और अपने हॉस्टल की और चलने लगी...मैं वहीँ बैठा उसकी उस भोली-भाली मुस्कराहट को अपने दिल और आँखों में बसाने लगा...क्या पता फिर उसे इस रूप में देखने को मिले न मिले...

"तुम से ज्यादा Handsome होना चाहिए..वरना तुम भी कोई बुरे नहीं हो...अगर माहि नहीं होती तुमको बॉय फ्रेंड बना लेती..." सिया रुक कर फिर पलट कर बोली....एक बार तो मेरा दिल मेरे मुह में आ गया हो जैसे...पर मैं सिया की इस आदत को जानता था....हम अक्सर ऐसे ही एक दुसरे को tease करते रहते थे....
"तुम कहो तो माहि को छोड़ दूं तुम्हारे लिए..." मैं भी उसके साथ शामिल हो गया...और उठ कर उसकी तरफ बढने लगा..

"नहीं...रहने दो मुझे किसी का बसा बसाया घर तोड़ कर अपना घर नहीं बसाना..." सिया बोल तो ऐसे रही थी जैसे मैं सचमुच माहि को छोड़ उसके साथ घर बनाने चला हूँ...मुझे मेरे बचपन में खेले घर-घर खेल की याद आ गयी....जहाँ अक्सर मैं किसी लड़की के साथ एक काल्पनिक घर बसाता था...और एक फिल्मी कहानी की तरह हम ख़ुशी-ख़ुशी एकसाथ रहते थे.....टी-पार्टी, बच्चो(गुडो-गुडी) की शादी....और ना जाने क्या क्या scene act किया करते थे...कभी इस लड़की के साथ तो कभी उस लड़की के साथ....रोज़ नयी wife होती थी....बचपन में खुशाल घर संसार सबकी कल्पनाओं में होता था....पर अब हम बड़े हो गए है..फिर भी मेरा और सिया एक काल्पनिक कहानी बनाते थे रोज़ नयी कहानी...बस मैं और वो और एक सुंदर खुशाल घर ही happy ending होती थी...या तो मैं बच्चा था या वो बच्ची थी या फिर हम दोनों....पता नहीं...पर यह खेल अब हमारा पसंदीदा खेल बन चूका था....कोई इस खेल को जानबूझ कर शुरू नहीं करता था..पर पता नहीं क्यूँ बस हो जाता था...एक दुसरे को tease करना आदत सी ही बन गयी थी...पर हम दोनों ही जानते थे की यह बस एक खेल भर ही है...असलियत सच्चाई तो येही है की हम बस अच्छे दोस्त हैं...

तभी सामने से आती सिया की room-mate और बेस्ट फ्रेंड, मुझे छोड़ कर सिया की वो ही अच्छी दोस्त थी, सुहाना ने बहुत उत्सकता से कहा... "सिया....तुम यहाँ हो....hi पियूष....चलो अच्छा हुआ दोनों साथ ही मिल गए...तुमको याद है कपिल का birthday  आ रहा है और वो हमें grand treat देने वाला है....और उसके birthday अगले Sunday को है...तो वो हम सबको Saturday morning ही अपने फार्म हाउस ले जा रहा है वही उसकी birthday पार्टी होगी.....हमें बस एक bus का arrangement करना है....तुम चाहो तो अपने किसी फ्रेंड को साथ लाना चाहते हो तो उसे भी ला सकते हो..."
"ओह्ह हाँ..मैं तो भूल ही गयी थी....की Mr Show Off का birthday आ रहा है..."
"सिया....तुम भी ना....अरे वो show off कर रहा है करने दो हम वहां मस्ती करेंगे.... इसी बहाने थोड़ी outing  भी हो जाएगी...just like a college trip ..." मैंने सिया से कहा....
"नहीं यार...तुम लोग जाओ...मुझे नहीं जाना" 
"अरे सिया...सब जा रहे है..तुम नहीं जाओगी तो क्या यहाँ अकेले वीरान institute में मंडराओगी क्या?....चलो यार सभी साथ होंगे मज़ा आयेगा...लड़के-लड़कियां सब साथ में....ऐसा मौका नहीं मिलेगा.." सुहाना ने भी जोर दिया....
"ठीक है...मुझे पता है तुम वहां किसके साथ मज़ा करोगी..." सिया ने फिर सुहाना से अपने पसंदीदा चुटकी लेने वाले अंदाज़ में कहा...हलाकि मैं कुछ समझ नहीं पाया..

Birthday के एक दिन पहले-(The Saturday Morning)

सभी दो दिन की इस पार्टी के लिए तैयार हो कर institute के main gate पे आ गए....bus का इंतज़ार कर रहे थे.....कुछ नए चेहरे भी थे...जो शायद हमारे साथ नहीं पढते थे... मैंने सोचा शायद कपिल के कुछ दोस्त होंगे....उसकी भी कितनी girl-friends  है इन्ही में से कई उसकी girl-friends रह चुकी होंगी....

दो bus आ गयी थी...मैं, भावेश, सुहाना, सिया और हमारे कुछ दोस्त सभी एक बस में चढ़ने लगे...सबसे पहले भावेश ने जा कर लास्ट सीट पे कब्ज़ा कर लिया.....फिर सिया को आता देख कर अपने साथ बैठने का इशारा कर बोला..."आओ...आओ..."...मगर सिया ने उसके आगे वाली सीट ले ली..."no thanks ...मैं और सुहाना साथ बैठेंगी" सिया ने भावेश के उड़ते पर फिर काट दिए....मैं भावेश के पास आ के बैठ गया...

पीछे आ रही सुहाना भी कम नहीं थी...सिया की सीट की दूसरी और जो सीट थी वहां जा कर बैठ गयी और बोली "नहीं सिया मैंने अर्जुन के साथ बैठने का वादा किया है so सॉरी" और इतना कहते ही अर्जुन भी सुहाना के साथ बैठ गया...अब मैं सिया के लटके चेहरे को देख उदास हो गया.. और भावेश के पास से उठ कर सिया के पास जा बैठा....और बोला "कोई नहीं मैं हूँ न.." सिया का चेहरा एकदम खिल उठा...

"पता होता सुहाना अपने boyfriend को भी ला रही है तो मैं कभी नहीं आती" मैं जानता था वो इस ट्रिप पे आना नहीं चाहती थी..."वो उसका boyfriend है..." मैंने सिया से पुछा..."तुमको नहीं पता पिछले चार हफ्तों से दोनों date कर रहे है.....दोनों net पे मिले थे...chating, social networking और फिर कुछ dates और प्यार होना ही था......आजकल यही तो करती रहती है मैडम प्यार..प्यार.प्याआआआआर ....सातवे आसमान पे उडती रहती है हमेशा....उफ़ भगवान्....मुझे कभी प्यार का रोग न लगे.."

"कोई नहीं मैं तो हूँ न......उसका boyfriend है तो तुम भी अकेली नहीं हो...मैं हूँ न तुम्हारा boyfriend ...official न सहीं खेल खेल में ही सही...." मैं उसको cheer up करने की कोशिश कर रहा था...सारा सफ़र एक साथ जो बैठना था....

बस चल पड़ी...खिड़की से ठंडी ठंडी हवा आने लगी...और सिया के खुले बालों की झुल्फे मेरे चेहरे पे लहराने लगी....सच कहू तो बहुत अच्छा लग रहा था....पर इस से मुझे माहि के लम्बे बालों की भी याद आ गयी...."मुझे पता होता की हम अपने boyfriend और girlfriend को भी ला सकते है तो मैं माहि को भी ले आता.."
"क्यूँ एक girlfriend से दिल नहीं भरता तुम्हारा जानू...." जैसे ही सिया ने कहा हम दोनों ही खिलखिला के हंस दिए...."jokes apart  ....माहि को भी ले कर आना चाहिए था...क्यूँ नहीं आई वो" सिया ने मुझसे पुछा....
"वो अपने fashion designing course में organised किसी workshop पे गयी हुई है....सो मैंने उस से पुछा ही नहीं..." मैंने सिया को बताया.....
"चलो अब कोई game खेलते है...." भावेश ने सीट पे खड़े हो कर सबसे कहा.....फिर हमने कुछ games खेली जैसे अन्ताक्षरी, Dumb Charades and other guessing games ....  जब भी सिया या मेरी बारी आती तो हम आराम से एक दुसरे के इशारो को समझ जाते...पता नहीं कैसे पर वो मेरा guess कर लेती और मैं उसका...हम दोनों की chemistry देखते ही बनती थी.....

खेलते खेलते समय कैसे बीत गया पता ही नहीं चला...अब आधा दिन बीत चूका था.....highway पे एक ढाबे पे कपिल ने सबको खाना खिलाया...और ड्राईवर से बस तेज़ दौड़ाने को कहा...हम फिर आ अपनी अपनी जगह बैठ गए.....खाने के बाद सबको नींद सी आने लगी...और बस में अचानक से शान्ति सी छा गयी...मैंने भी आँखों को आराम देने की सोची...थोड़ी देर बाद खिड़की से आती ठंडी ठंडी हवा ने मेरी नींद तोड़ी...पास बैठी सिया को देखा तो वो भी मीठी नींद में सो रही थी...उसने अपने बाल बाँध लिए थे...पर उसे भी ठण्ड लग रही थी...तो मैंने उठ कर खिड़की बंद करने की सोची...मैं खिड़की बंद कर ही रहा था तभी बाहर बारिश होने लगी....और बारिश की हलकी फुआर और कुछ बूंदे सिया के गालो पे पड़ी... जिसने उसको जगा दिया..."ह्म्म्म.....wow !!!!! बारिश....वो भी बिन मौसम की बारिश...खिड़की खुली रहने दो पियूष...मुझे ऐसी बारिश अच्छी लगती है...." सिया ने धीरे से कहा...

"मगर मुझे ठण्ड लग रही है...इसलिए बंद कर रहा हूँ" मैंने सिया को कहा... "ओह्ह...ठीक है रुको...खिड़की को रहने दो...तुम बैठो मैं अभी कुछ करती हूँ......" कहते हुए सिया सीट पे खड़ी हो के ऊपर रखे अपने बैग में से कुछ निकालने लगी...मैं वापस अपनी जगह बैठ गया....आस पास देखने लगा..कुछ लोग सो रहे थे और कुछ बारिश का मज़ा ले रहे थे....भावेश भी cd-player से गाने सुन रहा था...अचानक भावेश की आंखें बड़ी हो गयी और एक अजीब सी चमक आ गयी उसकी आँखों पैर...मैंने देखा वो सिया की तरफ देख रहा था.....

सिया अपने बैग से कुछ निकाल रही थी... इसलिए उसके हाथ ऊपर की और स्ट्रेच हो रहे थे....और इसी वजह से उसका पिंक टॉप ऊपर हो गया था...और उसकी low waist jeans भी और नीचे हो गयी थी...उसकी कमर और कमर से थोडा नीचे का थोडा सा बदन दिख रहा था....सच में उसकी पतली गौरी कमर बहुत सुंदर लग रही थी....और उसकी कमर पे एक सुंदर सा तिल बस गज़ब ढा रहा था....मेरे भी पसीने छुट रहे थे...मैं हडबडाते हुए उठा और बोला.."सिया मैं निकाल देता हूँ.... क्या चाहिए..तुम बैठ जाओ" सिया वापस बैठ गयी तब मैंने एक गहरी सांस ली और उसके बताये बैग में से एक चादर निकाल कर सिया को दे दी..."मेरे लिए नहीं तुम्हारे लिए तुमको ठण्ड लग रही है ना" सिया ने मुझे वापस चादर देते हुए कहा...

"ठण्ड तो तुमको भी लग रही थी....अपने लिए दूसरी निकाल लेता हूँ.."
"तुम भी चादर लाये हो क्या? मैं तो एक ही लायी हूँ अपने लिए...मुझे वैसे ज़रुरत नहीं है..मुझे बारिश अच्छी लग रही है...ठंडी ठंडी हवा भी"
"नहीं मैं तो नहीं लाया..ठीक है..पर जब भी तुमको ठण्ड लगे ले लेना...हम शेयर भी कर सकते है बहुत बड़ी चादर है..." कहते हुए मैंने चादर ओड़ ली...
"पियूष....तुम जानते हो मैं प्यार व्यार में विश्वास नहीं करती पर कभी कभी ऐसी बारिश मुझे और मेरे दिल को हिला कर रख देती है....मन करता है की काश कोई हो जिसके सीने पे सर रख कर इस बारिश का मज़ा लूं....वो मुझे कसके अपनी बाँहों में ले...उफ़...मैं भी ना जाने क्या सोचने लगी..देखा बारिश मुझ पर कैसा जादुई असर करती है...तुम बताऊ तुम इस मौसम में माहि को मिस नहीं कर रहे.."
"हाँ...माहि को तो मिस कर रहा हूँ...अभी वो तुम्हारी जगह बैठी होती तो मैं उसे अपनी बाँहों में भर लेता और फिर ....और फिर..." कहते कहते रुक गया मैं....फिर ऐसे ही मस्ती में बोला "वो नहीं तो क्या हुआ तुम तो हो"....हम लोग फिर एकसाथ हंस दिए....

थोड़ी देर बाद बारिश तेज़ हो गयी और बहार अँधेरा सा हो गया...जैसे सूरज को बादलों ने ढँक दिया हो.....सिया ने खिड़की बंद कर दी...क्यूंकि बहुत तेज़ की ठंडी ठंडी हवा चल रही थी...पर फिर भी आगे वाली सीट की खिड़की खुली होने की वजह से ठंडी हवा सिया को लग रही थी...यह देख मैंने उसे चादर का एक हिस्सा दिया...और अपना हाथ उसके पीछे गर्दन पे रख दिया....मेरे हाथ का सहारा मिलते ही पता नहीं कब उसने अपना सर मेरे कंधो पर  रख दिया....मैंने भी अपनी बाँहों को और कस दिया और उसको पूरा अपनी बाँहों में ले लिया...पता नहीं मुझे क्या हो गया था..या तो मौसम का जादू या फिर सिया की उन् बातों का असर था...मैं सच में उसकी चलती साँसों को महसूस कर सकता था...और शायद वो भी मेरी गरम सांसों को महसूस कर रही हो....

"अगर माहि होती तो...तो तुम.." सिया ने फिर धीरे से कहा...
"हम्म...माहि होती....ह्ह्ह्ह माहि होती तो मैं क्या बताऊ क्या क्या होता....शायद एक long kiss या तो वो मुझे देती या मैं खुद ही ले लेता...." इसके आगे मुझसे कुछ कहा नहीं गया...
"माहि बहुत खुशकिस्मत है तुम उसे मिले....कितना प्यार करते हो तुम उस से...सच तुम्हारा प्यार देख कर ही लगता है..काश मुझे भी कोई इतना प्यार करता....वो कहीं और होता...कोई और लड़की उसकी बाँहों में यूह होती फिर भी वो मुझे ही याद करता..." यह सुनते ही मेरे दिल और दिमाग दोनों जगह घंटियाँ सी बजने लगी...और मुझे लगा मुझे ज्यादा react नहीं करना चाहिए...मैं सिर्फ माहि का ही हूँ...सिया मेरी अच्छी दोस्त है बस......मन तो हुआ एक ज़टके से उसे दूर कर दूं...इस से पहले की मेरा मन डोल जाए....चाह कर भी मैं सिया को अपनी बाँहों से दूर नहीं कर पाया...

फिर तो जैसे सारा रास्ता ऐसे ही कटा..ना तो बारिश रुकने का नाम ले रही थी और ना ही हम लोग एक दुसरे से दूर हो पा रहे थे...सिया कभी आंखें बंद करती तो कभी खोल लेती...मेरा भी येही हाल था..कभी मैं सोने की नाकाम कोशिश करता तो कभी आगे वाली सीट की खिड़की बंद करने की सोचता....मगर मन के एक कोने में मुझे अच्छा भी लग रहा था....माहि की याद भी जो नहीं आ रही थी.....मैं भी इस ट्रिप पे नहीं आना चाहता था...चाहता था माहि के साथ दो दिन बिताऊँ मगर उसके workshop की वजह से...फिर मैं भी मन मार कर आ ही गया..पर यह नहीं पता था..की यह अनचाह सफ़र ऐसी roller coaster ride साबित होगी...काश की माहि की जगह सिया ही मेरी girlfriend होती......तो कमसे कम मुझे इतना uneasy सा महसूस नहीं होता बल्कि मैं इसका भरपूर मज़ा ले पाता.....

करीब 7 बजे हम कपिल के फार्म हाउस पे पहुचे....सभी सफ़र से थके हुए थे...कोई भी पार्टी के मूड में नहीं था..तो सभी ने रात के खाने के बाद अपने अपने कमरे में सो जाना ही ठीक समझा...कपिल ने सब इंतजाम अच्छे किये हुए थे...जो एक साथ एक कमरे में रहना चाहता है उनके लिए एक कमरा और जो अलग अलग कमरा चाहता है उनके लिए अलग...कुछ कमरे बाहर कैंप टेंट लगा के भी बनाये हुए थे....कुछ टेंट्स बारिश से ख़राब हो गए थे...तो कुछ ठीक-ठाक थे.....मैंने एक टेंट अपने लिए ले लिया....मैं भावेश के साथ नहीं रहना चाहता था...क्यूंकि मुझे डर लग रहा था कहीं बस में जो हुआ उसने सब देख सुन न लिया हो..आखिर हमारी पीछे वाली सीट पे ही तो था वो.....

सिया को उसके कमरे तक छोड़ने गया..तो लगा जैसे सिया कुछ कहना चाहती है पर नहीं कह पा रही....मुझे भी लगा मैं भी उस से कहूँ की यह सब जो बस में हुआ....मुझे अच्छा लगा...मगर मैं कह नहीं पाया...और उसे उसके कमरे में छोड़ कर अपने टेंट में आ गया....रात भर सोचता रहा की जो बस में हुआ वो क्या था...मैंने तो कभी सिया के बारे में ऐसा नहीं सोचा...फिर मुझे भावेश का सिया के लिए आकर्षण क्यूँ अच्छा नहीं लगता...क्यूँ सही नहीं लगता.....मैं क्यूँ सिया को भावेश से बचाना चाहता हूँ....सिया खुद भी तो भावेश से निपट सकती है...भावेश कभी उस से कुछ कह नहीं पायेगा...और ना ही कभी सिया समझ पायेगी...या फिर समझती भी हो...और न समझने का नाटक करती हो...नहीं...सिया और भावेश...नहीं..मैं कल्पना भी नहीं कर सकता दोनों को एकसाथ....तो क्या सिया ने मेरे बारे में कुछ ऐसा सोचा है....मुझे उस से पूछना चाहिए...या फिर नहीं पूछना चाहिए...अब जो हुआ सो हुआ अब आगे क्या...आगे क्या अब पहले की तरह हमारी दोस्ती रहेगी या हम पहले जैसे ही एक दुसरे से मिलेंगे...बाते करेंगे....O GOD यह क्या हो गया..क्या होगा हमारे दोस्ती के रिश्ते का...माहि का...नहीं मैं बस माहि का ही हूँ...माहि मेरी मंगेतर है... सिया मेरी दोस्त...हमें दोस्त ही बने रहना चाहिए...अगर सिया ऐसा वैसा कुछ सोच रही है तो मुझे उसकी गलत्फेमी दूर करनी पड़ेगी...कल ही बात करूँगा उस से इस बारें में..


to be continue....
~'~hn~'~

Note : This story is only a Fiction, not real story, It is only for inspirational.

Friday, October 14, 2011

अनजाना सा रिश्ता (part 2)

करीब दो साल बाद....

उस दिन की एक मुलाक़ात और जीवन भर साथ रहने का फैसला थोडा मुश्किल था....मेरे लिये नहीं... उसके लिए....क्यूंकि मैं तो कब से अपनी सपनो की रानी का जैसे इंतज़ार ही कर रहा था.....अपनी साड़ी पिछली सारी girlfriends में खोज रहा था उसे....की कब वो मेरी ज़िन्दगी में आए और मेरी ज़िन्दगी हमेशा के लिए बदल दे...दो साल हो गए हमें युही यदा-कदा मिलते मिलते....और एक साल पहले ही इस रिश्ते को एक नाम देते हुए.....उफ़....सच कहा है किसी ने सच्चा प्यार ज़िन्दगी के मायिने ही बदल देता है....

आज भी जब मैं उस दिन के बारे में सोचता हूँ तो मुझे यकीन नहीं होता कि जिस लड़की को मैं अक्सर अपने सपनो में देखा करता था वो ही आज मेरी मंगेतर है... माहि...हाँ माहि....जिसे मैंने सबसे पहले कब देखा था ये भी नहीं पता..शायद जब से होश संभाला तब से...या फिर जब से मैंने लड़के-लड़की के बीच होने वाले प्यार के रिश्ते को समझा तब से....माहि ही वो ही लड़की है जिसे देख कर मेरा दिल पहली बार धड़का था...जिसने मुझे लड़की के लिए आकर्षण का मतलब थोडा बहुत महसूस कराया था.  मैं जब भी अपने मामा के घर जाता था....तो वही बने बचपन के दोस्त कुनाल के घर आता जाता रहता था....जिसके घर के ठीक सामने ही माहि का घर था....कुनाल और मैं अक्सर कुनाल के कमरे की खिड़की से माहि के कमरे की खिड़की में आस लगाये झांकते रहते कि कब माहि हमको दिख जाए....बस एक झलक....कई बार हमारी किस्मत चमक भी जाती थी....माहि कभी बाल बनाती...तो कभी नाचती...तो कभी खिडकी से बाहर के नज़ारें निहारती हुई दिख जाती थी....सच वो भी क्या दिन थे....बचपना जाने को तैयार नहीं था और जवानी आने को बेक़रार थी....

और आज जब माहि मेरी है तो मुझे यकीन नहीं होता....मुझे क्या कुनाल को भी यकीन नहीं हुआ था जब मैंने अपने और माहि के रिश्ते के बारे में उसे बताया...मैं यकीन से कह सकता हूँ वो दिल ही दिल में मुझसे ईर्ष्या कर रहा होगा...
"तुम नाश्ते में क्या लोगे....कैंटीन से कुछ लेके आऊँ या फिर वही अपना मनपसंद पास्ता...." जैसे ही यह आवाज़ मेरे कानो में पड़ी...मैं फिर वापस अपने समय पे लौट आया...मैं अपने MBA University के boys hostel के रूम में बिस्तर पर लेटा-लेटा सोच रहा था....और भावेश मेरा room-mate और classmate है...अभी हमारा first year ख़त्म होने को बस 2 महीने और है...मुझे भावेश के साथ रहते रहते लगभग 10 महीने हो गए है....O GOD ...Help me.... हमेशा लड़कियों के बारे में fantasize करना...यहाँ वहां उनके अभद्र पोस्टर्स लगाना.....मगर जब लड़कियों से बात करने की बात आती तो उसके पसीने छुट जाते थे....

"पियूष...बताओ क्या लोगे..कैंटीन का नाश्ता या फिर पास्ता" भावेश ने एक बार फिर मुझसे पुछा..
"कैंटीन जाने की जरूरत नहीं....मैं तुम दोनों के लिए छोले भठूरे ले कर आई हूँ" कमरे में आते ही सिया बोली...सिया भी हमारी classmate है...और यहीं university के girls hostel में रहती है.....वो मेरी project/task partner है...हम दोनों को अक्सर सभी subjects के projects एकसाथ करने होते थे.....भावेश का पार्टनर साथ वाले रूम में ही रहता था...कपिल...वो कभी भी हमारे रूम में नही आता था....भावेश को ही उसके कमरे में जाना पड़ता था.....इसलिए हमारे कमरे में सिया कभी भी आ जा सकती थी..
"जल्दी से नाश्ता finish कर लो.....आधे घंटे के बाद ही Quant की क्लास है.." सिया छोले भठूरे के packet को खोलते हुए बोली...मैंने बिस्तर के साइड टेबल पे रखी टेबल घडी पर टाइम देखा....तो सच में टाइम बहुत कम था..हमको इस्सी टाइम में अपना नाश्ता, नहाना, Quantitative Techniques के पिछली क्लास के नोट्स का revision और तैयार भी होना था....

"Thanks सिया...आज भी तुमने हमें फिर से बचा लिया...वरना आज भी मैं assignment नहीं submit कर पाता...." भावेश ने सिया को एक टूक देखते हुए कहा....उसकी आँखों की चमक और खुले मुह से कोई भी बता सकता था की वो सिया के बारे क्या महसूस करता है.....वरना वो किसी लड़की को अपने कमरे में ऐसे ही आने जाने नहीं देता....जैसे ही मैंने उसे पहली बार बताया था की सिया मेरी पार्टनर है और एक assignment के लिए मुझे और सिया को रात भर काम करना है...girls hostel में लडको का आना मना है इसलिए सिया और मैं हमारे कमरे में अपना काम रात भर करेंगे....तभी भावेश की झटपट हाँ से मैं समझ गया था...वो क्या सोचता है सिया के बारे में....मगर सिया में ऐसा कुछ खास है ही नहीं जो उसे देख कर किसी को उस से प्यार हो जाए.....मुझे तो सिया simple और साधारण सी दिखने वाली लड़की है...हाँ वो दोस्त बहुत अच्छी है....मेरे लिए तो वो एक अच्छी assignment partner, बहुत intelligent, clever और एक अच्छी दोस्त है...ना जाने भावेश ने उस में ऐसा क्या देखा....

खेर यह तो रोज़ का ही है....हमने झटपट नास्ता ख़त्म किया...फिर नहाने चले गए...सभी लोग नहा कर तैयार हो कर कॉलेज के corridors में घूमते देखे जा सकते थे.....इसलिए बाथरूम फ्री मिल गए...नहाने के लिए मुझे सिर्फ आधी बाल्टी ही मिल पायी.....चलो आज  इतना पानी तो मिला...वरना आज भी नहाने की छुट्टी करनी पड़ती....जब वापस कमरे में गए तबतक सिया ने हमारे notes /assignments दूंढ लिए और हमारा बैग तैयार कर दिया.....

"तुमने मेरे बैग को हाथ क्यूँ लगाया...very bad habbit ...किसी के बैग की चीज़ों को हाथ नहीं लगाना चाहिए...." भावेश ने अपना बैग सिया से छीनते हुए डांटा.....और मेरी तरफ इशारा किया.....
"ठीक है...बिग बॉय....फ़िक्र मत करो मैंने तुम्हारी अप्सराओं वाली पत्रिकाओं को हाथ भी नहीं लगाया" जैसे ही सिया ने कहा...मैं और सिया एकसाथ जोरो से हँसने लगे...और हँसते-हँसते ही क्लास तक पहुंचे....

सिया ऐसी ही थी....वो कब क्या करेगी..कब तुमको अचानक हैरान कर देगी कोई नहीं बता सकता था....कभी कभी मुझे लगता है..की वो हम लडको के बारे में भी सभी कुछ जानती है....हम कब क्या सोचते है.....कैसे कब क्या करना चाहते है....अक्सर वो लडको की तरह ही सोचती है....मुझे कभी कभी लगता है जैसे वो उसका शरीर बेसक लड़की का है पर वो सोचती बिलकुल लडको की तरह है...बिलकुल बिंदास लड़की है सिया...बस एक बात ही लड़कियों से मिलती है उसकी वो अपने काम समय से पहले करती है....जैसा हर पढ़ाकू लड़की करती है....जब की लड़के एन टाइम पर काम करना शुरू करते है....सिया अपना काम करने के बाद अक्सर मुझे भी मेरा काम याद कराती है.....कभी कभी जब मैं माही से फ़ोन पे बात करता हूँ तो वो मेरे हिस्से का काम भी कर देती है...बस मुझे finishing करनी होती है.....कहने को दोस्तों की दोस्त है वो....बिलकुल लडको की पक्की दोस्तों वाली दोस्ती...सच दोस्ती निभाना अच्छे से आता है उसे....मैं अभी तक जितनी भी लड़कियों से मिला हूँ उन् सबमें से सबसे अलग है ये सिया...

कुछ दिनों बाद 

"कल ERP का suprise test कैसा हुआ तुम्हारा" सिया ने Marketing Research की बुक को बंद करते हुए मुझसे पुछा....
"ओके ओके ही गया...और तुम्हारा....?" मैंने अपने नोट्स को ठीक करते हुए कहा.....
"हमेशा की तरह फर्स्ट क्लास...अच्छा इस weekends भी तुम माहि से मिल रहे हो क्या?"
"पता नहीं अभी तक तो कोई प्लान नहीं बनाया.....हम लोगो को Quant के कुछ concepts revision करने चाहिए...dont you think...we should do studies together on that...."
"मगर वो तो हम परसों ही कर चुके है......क्या बात है पियूष...सब ठीक तो है....माहि से कुछ झगडा हुआ है क्या?"
"नहीं...ऐसी कोई बात नहीं है....बस ऐसे ही...मुझे याद नहीं रहा की हमने वो revise कर लिया है..." मैंने सच छुपाने की बहुत कोशिश की..पर..

"मुझे बनाओ मत....कोई बात तो है....ठीक है तुम नहीं बताना चाहते तो कोई बात नहीं...चलो इस weekend कोई खास काम नहीं है...हम लोग weekend साथ बिताते है...खूब घूमेंगे....फिरेंगे...hostel और university से दूर....मस्ती करेंगे....बस हम दोनों....खूब मज़ा आयेगा.."

मेरे पास सच में weekend को करने को कुछ नहीं था....सो हम लोग weekend की first morning ही institute के gate पे मिलने का प्लान बनाया.....मैंने माहि की गिफ्ट की हुई ब्लैक जींस और क्रीम टी-शर्ट पहनी...यह कुछ अलग सा था....मैं माहि का दिया गिफ्ट सबसे पहले उसी के लिए पहनना चाहता था....पर करता क्या न करता भावेश ने सभी तंग के कपडे धोने के लिए दे दिए थे....

"यार तुम आज तो सिया से पूछोगे ना..." भावेश को जैसे ही पता चला की मैं और सिया बाहर एकसाथ जा रहे है...तो उसकी वही सिया से बात करने की गाथा शुरू कर दी...
"ह्म्म्म" बाल बनाते हुए मैंने हलकी सी हामी भरी...अचानक मेरा फ़ोन बज उठा....
"हेल्लो...माहि...तुम ही हो ना माहि .....यार इतना क्या नाराज़ होना...मैंने बोला तो अगले महीने पक्का हम लोग outing करेंगे..."

"नहीं...पियूष रहने भी दो...मैंने ही गलत मांग की थी...कोई बात नहीं..मैं नहीं तुम ही नाराज़ लगते हो मुझे..इस weekend का कोई प्लान नहीं बनाया तुमने.....इतना ज्यादा नाराज़ हो मुझसे....सॉरी पोप्लू...मुझे समझना चाहिए तुम पर पढाई का कितना pressure है....चलो अब छोड़ो....अभी तो इस weekend का प्लान बताओ.....या फिर इस weekend भी तुमको कोई पढाई करनी है...जानू"

"माहि..मैं तुमसे नाराज़ नहीं हूँ....मुझे लगा तुम नाराज़ हो मुझसे.....इस लिए पिछले weekend का प्लान तुमने cancel कर दिया था....पढाई तो मैं जितना हो सके weekdays में ही पूरा करने की कोशिश करता हूँ...तुमसे मिलने की बेकरारी मुझसे न जाने क्या क्या करवाती है...."

"हाँ जानती हूँ तभी तो मुझसे ज्यादा किताबें पसंद है तुमको...काश मैं भी एक किताब होती....तो कम से कम सारा समय तुम्हारे हाथो में तो रहती.....तुमसे इतनी दूर तो नहीं रहना पड़ता..." माहि ने ऐसा बोल के जैसे मेरे दिल के किसी बुलबुले को छु कर उसे फोड़ दिया हो...

"काश...हाय....चलो फिर मिल लेते है आज...कहाँ मिलना है बोलो आ जाऊंगा..."
"ह्म्म्म....वही अपने पुराने अड्डे पे मिलते है.." यह सुनते ही मेरे दिल में जैसे मोहक रोमांटिक गाने का संगीत बजने लगा....अभी गाना ख़त्म भी नहीं हुआ था...की मेरी आँखों के आगे सिया का मायूस चेहरा मंडराने लगा....
"सिया...सिया..वो..."
"क्या सिया..सिया...क्या हुआ..पियूष...मैं सिया नहीं तुम्हारी गर्ल फ्रेंड माहि हूँ"...

"हाँ माहि...वो असल में मुझे सिया से मिलना था.....चलो कोई नहीं मैं उसे मना कर दूंगा..वो अकेली ही पढ़ लेगी...मेरे लिए तुमसे मिलना ज्यादा ज़रूरी है....दो हफ्तों बाद तुमको देखने के लिए में बता नहीं सकता कितना बेक़रार हूँ.."
फ़ोन रखते ही मैं institute के gate की ओर चल पड़ा...रास्ते भर सोचता रहा की सिया से क्या कहूँगा...सिया को बुरा लग गया तो...पर सच कहूँ तो एक तरफ एक आशा भी थी की वो समझेगी...वो मेरे और माहि के रिश्ते को जानती है.....समझ जाएगी...

तभी मुझे सामने से आती सिया दिखी... pink  और white color की floral dress में सिया बिलकुल अलग लग रही थी...मैंने कभी उसे ऐसा नहीं देखा था....एक पल के लिए मैं भी सब कुछ भूल ही गया था...पर अंदर से आवाज़ आई focus .... focus on माहि...माहि.... माहि....माहि और सिया को कोई मुकाबला होना ही नहीं चाहिए....माहि ही हमेशा जीतेगी...वो तेरी मंगेतर है....सिया बस एक दोस्त.....दोस्ती और प्यार में प्यार ही जीतता है....माहि को मायूस नहीं कर सकता...

"ओये होए...Hi handsome ...Hi handsome ...पियूष मैं सिया हूँ...माहि नहीं...इतना सजधज के आने की क्या ज़रुरत थी....ऐसा करोगे तो मेरा क्या होगा...कहीं मेरा दीन-ईमान न डोल उठे...माहि के लिए मुश्किल न खड़ी कर दूं मैं...हिहिहिहिहिहिहिही" सिया खिलखिलाती हुई बोली....वो अक्सर ऐसे ही चुटकी लेती थी...मुझे छेडती थी....
"मेरी छोड़ो...तुम किस के लिए इतना सजके आई हो....मेरे लिए...भूल गयी मैं पहले से ही किसी का हूँ.."

"ह्म्म्म.....कैसे भूल सकती हूँ...काश मैं माहि और तुम्हारे मिलने से पहले मिली होती तुमसे.....खेर ऐसा कुछ नहीं है मेरे cousin के यहाँ पार्टी है मुझे वहां जाना है इसलिए इतना सजके आई हूँ....मुझे रात को ही उसका फ़ोन आया था....सॉरी पियूष..हम लोग फिर कभी बाहर चलेंगे....इस बार तो...." यह सब सुनके मैं अंदर अंदर बहुत खुश हो गया.....

सिया फिर से बोली..."क्यूँ न तुम मेरे साथ मेरे cousin की पार्टी में चलो...हम वहां भी मज़ा कर सकते है..."
"नहीं...सिया रहने दो....वो असल में मुझे भी माहि से मिलने जाना है येही बताने आया था..उसका अभी फ़ोन आया था....अभी अभी ही प्लान बना है ... " सिया को बीच में रोकते हुए मैं बोला..

सिया को ऑटो करा कर मैंने भी अपने लिए ऑटो किया और चल पड़ा अपनी सपनो की रानी से मिलने.....


to be continue....
~'~hn~'~

Note : This story is only a Fiction, not real story, It is only for inspirational.

Thursday, October 13, 2011

अनजाना सा रिश्ता (part 1)

"ऑटो"...."ऑटो"......मैं लगातार सड़क के किनारे से आवाज़ लगा रहा था..और सभी ऑटो रिक्शा सवारी लिए ही आ रहे थे......"गाडी को भी अभी ख़राब होना था....माँ के सुबह से बीस फ़ोन आ चुके थे......" मन ही मन मैं बुदबुदा ही रहा था की एक आवाज़ आई...."साहेब जी कहाँ जाना है.." देखा तो एक टेक्सी की खिड़की से बाहर सर निकले टेक्सी ड्राईवर मेरी और देख रहा था......."साहेब इस समय यहाँ ऑटो या टेक्सी मिलना ज़रा मुश्किल है.....वैसे आपको जाना कहाँ है....मकेनिक चाहिए ना.....चलिए मैं ले चलता हूँ" उसने फिर से कहा...
 
"नहीं मकेनिक नहीं.....मुझे एअरपोर्ट के पास foodvilla restaurant है बस वही पंहुचा दो......थोडा जल्दी है" मैंने ड्राईवर से बहुत नम्रता से कहा.....

"ठीक है साहेब..आईये बैठिये....पर हाँ मीटर के हिसाब से 100 रुपए ज्यादा लूँगा...क्यूंकि एअरपोर्ट मुझे उल्टा पड़ेगा" उसने दबंग अंदाज़ में कहा...

"ठीक है" बोल कर मैं टेक्सी के अंदर सामान के साथ बैठ गया...मरता क्या न करता.....कोई और समय होता या मुझे इतनी जल्दी नहीं होती तो मैं इस टेक्सी में शायद ही बैठता....दुसरो की मजबूरी को अपना फायदा कैसे बनाते है...ये सभी को कलयुग सिखा ही देता है......अभी समय मेरे साथ नहीं था देरी हो रही थी कोई मेरा इंतज़ार कर रहा था और मैंने ही वो restaurant कुछ दिनों पहले सुझाया था माँ को..... 

एक हफ्ते पहले

घर में पहला कदम रखते ही मैं माँ से बोला "माँ अगले हफ्ते मुझे ऑफिस के काम से Banglore जाना होगा...."
"अच्छा......कितने दिनों के लिए" माँ ने पुछा...
"हम्म...कितने दिनों के लिए ये तो अभी नहीं पता....अभी बाकी सब decide होने में टाइम लगेगा...बस तुम मेरा सामान पैक कर देना अगले हफ्ते..." मैंने अपने जूतों के फीते खोलते हुए कहा...
"बस अब यही काम रह गया है...पहले कॉलेज हॉस्टल के लिए सामान पैक करती थी...अब ऑफिस टूर के लिए...ना जाने कब कोई और आयेगी तेरी जिन्दंगी में तेरा सामान पैक करने के लिए" माँ ने रसोई में जाते हुए कहा...

"माँ तुम फिर शुरू हो गयी..." यह बोल कर मैं फ्रेश होने बाथरूम में चला गया...
जब कपडे बदल कर बाहर आया तो पापा पहले ही dinning टेबल पे बैठे हुए थे..."वाह: आज बेटे के लिए बहुत कुछ ख़ास बनाया है तुमने" पापा सामने रखे बर्तनों में झाकते हुए माँ से कहा...
"तो क्या....जैसे तुम्हारे लिए कभी कुछ खास नहीं बनाती मैं....." माँ ने जवाब दिया...
"देखा बेटा अपनी माँ को.....चलो आ जाओ...खाना शुरू करे..." पापा मुझे देखते ही कहा...
"पहले अपनी बहन को बुला ले......अपने कमरे में कबसे पढ़ रही है"...माँ ने मुझे बताया...
मैं भी आज्ञाकारी बेटे की तरह अपनी बहन पीहू के कमरे की ओर बढ गया.....उसके स्कूल के half yearly exams शुरू होने वाले थे इसलिए उसका आधे से ज्यादा दिन अपने कमरे में पढाई करते हुए बीतता था....

"पीहू...पीहू....." मैंने कमरे के बाहर से ही आवाज़ लगायी..."माँ बुला रही है आजा..खाना खा ले...सब के साथ खाना खाने के बाद पढ़ लेना"...."आई भैया..." अंदर से उसकी मीठी सी आवाज़ आई....सुबह से यही मेरे लिए पहली मीठी आवाज़ थी....वरना घर में माँ की जिद से भरी आवाज़, पापा की दो-तुक मगर प्यार से बात, ऑफिस में बॉस की कड़क और रोबदार आवाज़ और सहयोगियों की खिटपिट और शोरशराबे की आवाज़ें.....सच कहा है किसी ने नौकरी के लाइफ एकदम बोरिंग हो है.....आधे से लाइफ का मज़ा ज्यादा खून पसीने के साथ ऑफिस में निकल जाता है...बाकी की कसर घर वाले शादी और जिम्मेदारियों के बोझ के बारे में बातें कर कर के दिमाग और दिल से भी जीवन का असली रस भी बेस्वाद कर देते है.....कॉलेज टाइम पर पैसो के अभाव के चलते जीने का मज़ा पूरी तरह सही में नहीं ले पाते....थोड़ी सी मौज-मस्ती से संतुष्ट होना पड़ता है....सोचते है एक अच्छे से पढ़-लिख ले....कुछ बन जाएँ....फिर तो अच्छी नौकरी और अच्छी तन्खाह होगी....हाथों में ढेर सारा पैसा...फिर कौन हमें रोक सकेगा....जीवन का भरपूर लुफ्त उठाएंगे....पर तब किसे पता था हाथों में पैसे होते हुए भी...अब हमें समय और जोश का अभाव होगा....यह मुझे नौकरी के एक साल बाद ही पता चल पाया...

"चलो भैया...." पीहू की मीठी आवाज़ एक बार फिर कानो पे पड़ी.....सच में छोटी बहन की मासूम आवाज़ ने मेरा
दिल भर दिया...पता नहीं क्यूँ मैं अंदर ही अंदर ख़ुशी से जैसे भर सा गया..."चलो मिस पढ़ाकू.....माँ ने आज सब
हमारी पसंद का ही बनाया है"

हम सब चुपचाप खाना खा रहे थे....तभी माँ ने चुपी तोड़ी "आज तुम्हारी पायल आंटी का फ़ोन आया था....वो दादी बनने की ख़ुशी में एक समारोह कर रही है....हमें बुलाया है....तुम्हारी शादी के बारे में भी पूछ रही थी....मुझसे तो कोई जवाब देते नहीं बना..."
"माँ आप फिर से....पापा माँ को समझायिये ना" मैंने पापा से आग्रह किया...मेरा सब्र का मटका पूरा भर चूका था....


"मगर बेटा....वो गलत क्या बोलती है...शादी कब करनी है यह तुम्हारा ही निर्णय होगा...मगर कम से कम लड़की देख कर पसंद तो कर ही सकते हो.....इसमें क्या बुरा है....अच्छा रिश्ता ढूँढने में भी वक्त लगता है" पापा मुझे ही समझाने लगे...ऐसा लग रहा था जैसे यह सब उनकी मिली भगत है....पर मैं यह भी जानता था कि पापा हमेशा से ही माँ का साथ देते आये है....और इसी तरह साथ देते है वो दोनों....मैं चाह कर भी ना नहीं कर सका.."ठीक है पापा..आप कहते हो तो लड़की से मिल लेता हूँ"
"ठीक है फिर मैं कल ही लड़की को घर बुला लेती हूँ या फिर उसी के घर चलते है" माँ को तो जैसे खुली छुट मिल गयी थी अपनी तेज़ गाडी दोड़ाने की......

"माँ कल.....नहीं माँ...इस हफ्ते मुझे बिलकुल भी टाइम नहीं है....banglore टूर की सारी प्लानिंग करनी है....Presentation बनानी है.....टिकेट और होटल बुक करने है..ऊपर से रोज़ की बॉस की बातें और काम भी करना है ऑफिस में....मुझे तवन्खा ऐसे ही नहीं देते वो लोग...कोलू के बैल की तरह काम भी करवाते है...और मैं पहले लड़की से अकेले मिलना चाहूँगा....फिर मुझे लड़की पसंद आने पर आप परिवार मिलन करते रहना"

"देखा आपने मुझे इस लड़के की बातों पे अब विश्वास नहीं होता....पहले ना-ना बोलता रहा...और अब हाँ बोली है तो लाड साहेब के पास टाइम नहीं है..." माँ का खिला हुआ चेहरा फिर से मुरझा सा गया....पापा ने मेरी तरफ आशा भरी नज़रो से देखा...

"माँ ऐसा नहीं है....अब मैं बोल रहा हूँ लड़की से मिल लूँगा....तो मिल लूँगा...पर हाँ अकेले ही मिलूंगा..."
"हाँ अकेले ही मिल लेना..पर मिलेगा कब...टाइम तो है नहीं ना तेरे पास"
"टूर से वापस आके मिल लूँगा"
"टूर के बाद....यानी दो-तीन हफ्ते बाद...कहीं तब तक तेरा इरादा फिर बदल गया तो.....नहीं मैं यह risk नहीं ले सकती"
"तो तुम क्या चाहती हो टूर पे जाने से पहले मिलू?...."
"हाँ .....और वादा कर लड़की से अच्छे से मिलेगा...." माँ की दादागिरी से मैं बिलकुल सकपका सा गया...

"ठीक है मैं वादा करता हूँ...कि मैं अच्छे से मिलूँगा....और टूर पे जाने से पहले मिलूँगा...जैसे ही मुझे काम से टाइम मिलता है मैं आपको बता दूंगा" माँ को कह तो दिया....वादा कर तो दिया....पर क्या ऑफिस की busy लाइफ मुझे थोडा सा समय देगी भी की नहीं कौन जानता था...

दो-चार दिनों मैंने टिकेट भी बुक करा ली...और साथ ही साथ माँ को लड़की से मिलने का समय और जगह भी बता दी....

"माँ वो एअरपोर्ट के करीब है....मैं उस से मिल कर...वहीँ से एअरपोर्ट चला जाऊंगा...और मैंने तुम्हे लड़की से मिलने का वादा किया था.....फिर जगह कोई भी हो....जानता हूँ उस को थोडा दिक्कत होगी....पर तुम्ही सोचो....मैं अपने 1 हफ्ते लम्बे banglore trip से पहले ही लड़की से मिल रहा हूँ जैसा कि मैंने तुम्हे वादा किया था"
टेक्सी की खिड़की से आती ठंडी हवा मुझे बता रही थी कि अब मैं नेशनल highway पे पहुँच गया था....और बस जल्दी ही वहां पहुँच जाऊंगा....

अचानक मेरा फ़ोन बज उठा....

"हेल्लो"
"हेल्लो बेटा....पहुच गया क्या?"
"हाँ माँ बस 20-25 min में पहुच जाऊँगा.....आप बार बार कॉल करना बंद करो...."
"अब एक माँ अपने बेटे को फ़ोन भी नहीं कर सकती"
"please माँ...मैं फ़ोन रख रहा हूँ"

21th कॉल माँ भी ना.....जैसे मेरी शादी करना बस यही एक काम रह गया है उनकी लाइफ में.....OO No एक बात तो बोलना भूल ही गया माँ को....मैंने एक बार फिर फ़ोन निकला और सीधा पापा का नंबर मिला कर गाडी ख़राब हो गयी है...और गाडी कहाँ है बता दिया...वो गाडी को ठीक करा के वहां से ले जायेंगे..

फ़ोन काट कर मैं फिर एक बार सोचने लगा....अभी तो नौकरी लगी है और अभी से शादी का चक्कर...इस लाइफ से अच्छी तो कॉलेज लाइफ थी....आजाद मदमस्त भँवरे की तरह कभी इस फूल तो कभी उस फूल.....हाँ मेरी कुछ ex-girl-friends थोड़ी सी out of the world थी.....जिनका I.Q. बिलकुल न के बराबर था....और कुछ ज़रुरत से ज्यादा ख्याल रखने वाली थी जिनको पल पल की खबर चाहिए होती थी....मानता हूँ कोई भी व्यक्ति perfect नहीं होता.....पर फिर भी उन् सभी लड़कियों में से कोई भी मुझे इतनी पसंद नहीं आई कि मैं सारी जिन्दंगी उसके साथ बिता सकूँ....और आज देखो..मैं शादी के लिए लड़की पसंद करने जा रहा हूँ.....क्या एक बार मिलने से हम दुसरे को जान-समझ पाएंगे....पसंद कर लेंगे एक दुसरे को......यह सचमुच बहुत अजीब था.....पर माँ के लिए...माँ से किए वादे के लिए.....

"लो साहेब जी पहुच गए" इतना सुनते ही मेरे बदन में एक सनसनाहट सी दौड़ गयी....टेक्सी ड्राईवर को किराया दे कर सूटकेस उठाये अंदर जा कर मैं अपनी reserve table ढूंढने लगा...टेबल नंबर 9 ....वहां मैंने मेरी पीठ किए लाल और हरे रंग की कुर्ती पहने लड़की को बैठे देखा.....अचानक मेरा दिल जोरो से धड़कने लगा और पैर तेज़ी से उसकी ओर बढ़ने लगे....ऐसा मैंने पहले कभी भी महसूस नहीं किया था.....अभी तो मैंने उसे देखा भी नहीं था....और अभी से जैसे उसका सम्मोहन मुझे मोहित कर अपनी ओर खिंच रहा हो....

"नहीं..... नहीं.....ये बस किसी से पहली बार मिलने की उत्सकता भर ही है कोई सम्मोहन नहीं....अभी तो मैंने उसे देखा भी नहीं.....हाँ यह उत्सकता थोड़ी अजीब सी है.....बिलकुल वैसी जैसी पापा को हुई थी जब वो माँ देखने गए थे...." मैं खुद को ही मन ही मन समझाने लगा "आज समझ आया पापा उस मुलाक़ात को अभी तक क्यूँ नहीं भूला पाए है..क्यूँ वो अक्सर वो किस्सा माँ के मन करने के बावजूद हमें सुनाते थे....माँ को शायद अपने बच्चो को यह सब बातें बताना अजीब लगता होगा.."

खैर टेबल 9  तक पहुच कर मैंने अपने पुराने स्टाइल में लड़की के पीछे से बोल दिया....
"Hi ....Hello....मैं पियूष......" आवाज़ को मैंने जानभूझ कर कड़क, वजनदार और रोबदार ही रखी....जैसा की कॉलेज टाइम पे लड़कियों पर अपना जादू चलने के लिए किया करता था....

लेकिन मेरा यह वजनदार और रोबदार रूप ज्यादा देर तक नहीं रह पाया....जैसे ही वो लड़की पलटी...और मेरी नज़र उस पर और उसकी नज़र मुझ पर पड़ी....नज़रें आपस में टकराई और हम दोनों ही एक दुसरे को देखते ही रह गए....जैसा की अक्सर मैं अपने रोमांटिक सपनो में या फिर रोमांटिक फिल्मों में देखा करता था.....मुझे मेरी आँखों पे विश्वास ही नहीं हो रहा था.....वो सपना सच हो गया है और वो भी ऐसे...इतनी अजीब situation में.....

to be continue....
~'~hn~'~

Note : This story is only a Fiction, not real story, It is only for inspirational.

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