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Thursday, March 31, 2011

पर डरती हूँ

तरसती आँखों ने थे देखे हजारो सपने
पर डरती हूँ कहीं वो टूट न जाए,
इंतज़ार में हूँ एक हमसफ़र के साथ का
पर डरती हूँ कहीं साथ छूट न जाए॥

अंधेरों में बैठी हूँ रौशनी की आस लिए
कोई सूरज बन कर आए अँधेरा दूर भगाए,
अंधेरों की तो आदत हो गयी है हमे
पर डरती हूँ कहीं फिर वो सूरज डूब न जाए॥

तरसती आँखों ने थे देखे हजारो सपने.......

किनारे पे खड़ी साहिल को निहारती हूँ
कि काश कोई मुझे उस पार ले जाए,
साथ मेरे माझी भी है और नाव भी
पर डरती हूँ बीच भँवर डूब ना जाए॥

तरसती आँखों ने थे देखे हजारो सपने.......

रूठी है किस्मत रूठा है सारा जहाँ
हम है जिसके सहारे न जाने वो है कहाँ,
जाना चाहती हूँ उसके पास हमेशा के लिए
पर डरती हूँ कहीं वो भी रूठ न जाए॥

तरसती आँखों ने थे देखे हजारो सपने.......

हजारों सपने करोड़ों ख्वायिशें
अनगिनत अरमानो और प्यार का खजाना,
कितना है संजोया रखा छिपा कर सालो से
पर डरती हूँ कहीं यह खजाना लूट न जाए॥

तरसती आँखों ने थे देखे हजारो सपने
पर डरती हूँ कहीं वो टूट न जाए,
इंतज़ार में हूँ एक हमसफ़र के साथ का
पर डरती हूँ कहीं साथ छूट न जाए॥ 
~'~hn~'~

आख़िर क्यों

क्यों आज इंसान खुद ही एक वेहेशी जानवर बन गया है।
क्यों वो आज भी मज़हब के नाम पे लड़ता रह गया है॥
क्या सच में यहाँ कोई मुस्लिम या कोई हिन्दु रह गया है।
क्या एक दुसरे को मारना काटना धर्म का मतलब यही रह गया है॥
क्या यह गीता में लिखा है,
कि जो हिन्दू है वही इंसान रह गया है।
क्या यह कुरान में लिखा है,
कि मुस्लिम कौम ही बस एक मज़हब रह गया है॥
क्या इस्सू मसि ने यह कहा है,
कि रोटी की जगह गोलियाँ ही बांटना रह गया है।
क्या गुरु नानक ने सिखाया है,
कि दुसरे के घर घुस वहां दहशत बचाना रह गया है॥
कितना कत्ले आम किया अब तो लड़ना छोडें हम,
अब एक दुसरे को फिर से गले लगना रह गया है।
शान्ति बनाये एकजुट हो जाए एक मानव धर्म निभाए,
फिर इस धरती माँ को गले लगना ही रह गया है॥
उन वीर जवानों ने अपना धर्म निभाया है,
अब उनकी इस अनकहीं कुर्बानी का क़र्ज़ निभाना रह गया है।
धरती माँ के वो पूत कुछ करने आए थे,
जिस मिटटी संग खेले बचपन में उसी में समाना रह गया है॥ 


~'~hn~'~
(One of the poems written by me after Mumbai Attack-26 Nov 08 .....)

Wednesday, March 30, 2011

नाज़ हो तुम मेरा

 

जब-जब मुझे धूप ने है सताया
तुम बने मेरे रहगुजर मेरा साया।
वैसे तो तुम ही इस तरह हो लिपटे
दिल के करीब बन कर मेरा हमसाया।
  




 
धूल मिटटी में जो मैं कभी बाहर चली भी जाती
तो तुम मेरे सर से मेरे चेहरे तक मुझे यूँ है ढकते। 
कि कब सुबहे से दोपहर हुई और कब घर से निकले
हुई शाम कब दिन गया गायब तुम संग ढलते ढलते।

  

कहीं जो मुझे कभी कोई दूर खड़ा यूँही एकटक निहार कर
मुझे मेरे बचपन को भूल कर नई-नई जवानी की याद है कराता।
न जाने कब हवा है चलने लगती और तुम अटखेलिया करते
जैसे तुमको मेरे दिल में चल रही हलचल का है पता चल जाता।



कभी हो तुम पीले कभी नीले तो कभी हो लाल
मेरे रंग रूप का तुमको है सदा ख्याल।
कभी जो भूली मैं घर पर अपना रुमाल
तुमने ही साथ दिया हमेशा साफ़ रखे मेरे गाल।

   



तुमको कोई मेरी लाज है कहता
कोई बताता तुम्हे मेरा नखरा।
पर सिर्फ़ तुम और मैं ही जानते है की
तुम सिर्फ़ मेरा दुपट्टा नही नाज़ हो तुम मेरा। 
~'~hn~'~ 

Saturday, March 26, 2011

संस्कार

देव एक middle class का सीधा-साधा 17 साल का लड़का था। उसके पापा एक सरकारी दफ्तर में छोटे से कर्मचारी थे। उसके घर की माली हालत ठीक न होने के कारण देव कभी भी अपना मनचाहा कोई भी सामान नहीं खरीद पाता था। उसका भी मन करता था कि वो दुसरे लड़को की तरह अच्छे-अच्छे नए-नए कपड़े पहने जो की नए ज़माने के फैशन के हो। वो भी दुसरे लड़को की तरह खूब सारी मस्ती करना चाहता था। उसे भी सुंदर-सुंदर नयी-नयी चीज़ें चाहिए थी। 

एक बड़ी-सी सड़क के किनारे गुमसुम सा सोच में डूबा हुआ देव..मन ही मन अपनी किस्मत को कोस रहा था। तभी उसका ध्यान एक तेज आती bike की ओर गया। bike बहुत जोर से आती हुई देव के पास से गुजरी एक बार तो देव भी डर गया था कि यह क्या हुआ। फिर जब bike चली गयी तो फिर सोचने लगा। मेरे पास भी bike होती तो मैं भी थोडा-सा स्टाइल में रहता। फिल्मी हीरो की तरह bike चलाता। वो मन ही मन अपने आपको bike चलाते हुए देखने लगा। फिर दो मिनट के बाद फिर उसे वही bike की आवाज़ आई जो की इस बार दूसरी तरफ से आ रही थी। इस बार bike की speed कम थी। bike पे बैठा लड़का लगभग देव की उम्र का ही दिख रहा था। उसने नए फिल्मी हीरो की तरह designer shirt और jeans पहनी हुई थी। उसने इस शाम के समय भी काला चश्मा पहना हुआ था। देव को पता था उस काले चश्मे को बड़े पैसे वाले लोग Goggles या फिर sunglasses कहते है। मगर देव के दोस्त तो उसे धूप का चश्मा ही कहते थे। देव यह भी जनता था कि उस लड़के ने वो धूप का चश्मा स्टाइल मारने के लिए ही पहना हुआ है वरना यहाँ धूप जैसा कोई मौसम नहीं था। शाम हो चुकी थी। वो bike वाला लड़का एक नयी फिल्म का गाना गुनगुनाता bike चला रहा था। बीच-बीच में सीटियाँ भी मार रहा था। वो bike फिर से एक बार मूड कर वापस आई। इस बार वो लड़का लहरा-लहरा कर bike चला रहा था। देव उसी को ध्यान से देखने लगा। bike फिर से दूर गायब हो गयी।

फिर अचानक देव को किसी कुत्ते की आवाज़ आई। उसने देखा कि ठीक उसके सामने कुछ ही दूरी पर एक कुत्तिया सड़क के उस और मुह करके भौंक रही थी। देव ने उस ओर देखा जहाँ वो मुह करके भौंक रही थी तो देव की नज़र सड़क की उस ओर खड़े छोटे से पिल्ले(puppy) पे पड़ी जो कि सड़क पार करने से डर रहा था। शायद उसकी माँ उसे इस पार आने को कह रही थी। गाडियाँ भी सड़क पे आ जा रही थी जिसकी वजह से वो पिल्ला डर रहा था। देव ने सोचा क्यों न उस पिल्ले को उसकी माँ के पास पंहुचा दूँ। तो देव सड़क पार करने लगा। तभी उसने देखा सड़क clear होते ही हिम्मत करके वो पिल्ला कुछ आगे बढ़ा और सड़क पार करने लगा। तभी देव ने देखा कि वो bike वाला लड़का फिर से तेजी से bike ले कर आ रहा है। देव उस पिल्ले की ओर भागा। bike की speed बहुत तेज थी। देव ने bike की speed की परवा किए बिना पिल्ले को बचा लिया। पिल्ला उसके हाथो में ज़ोर-ज़ोर से चिल्ला रहा था। उसके मिमयाने की आवाज़ से साफ़ समझ आ रहा था कि वो कितना डर गया था। देव ने उसके धड़कते दिल को महसूस किया जो जोरो से धड़क रहा था। कु कु कु कर वो अपनी माँ को बुला रहा था। देव ने उस पिल्ले को उसकी माँ के पास पंहुचा दिया जो कि अपने बच्चे के लिए बिलख सी रही थी।

तभी देव को तालियों की आवाज़ आई। उसने देखा सड़क के दोनों किनारे कुछ लोग खड़े हो कर उसके लिए तालियाँ बजा रहे थे। सब देव की तारीफ किए जा रहे थे और साथ ही साथ उस bike वाले लड़के को बुरा भला कह रहे थे। देव फिर अपनी रहा पे चल दिया और फिर से सोचने लगा कि उस bike वाले लड़के से अच्छा तो मैं हूँ। वो चाहे बड़े घर का लड़का हो पर देव तो बहुत अच्छा लड़का है। उसने एक जीव की जान बचायी है। वो bike वाला लड़का अपनी जवानी के नशे में चूर है और उस नशे में वो क्या कर रहा है उसे भी नहीं पता। आज वो एक जीव की जान ले लेता। और जबकि देव भी जवान है पर उसे पता है कि वो क्या कर रहा है। उसने आज एक बहुत अच्छा काम किया है। उसके पास पैसा न हो पर अच्छे संस्कार है। उसके पास अच्छा पहनने को, अच्छा खाने को, स्टाइल मारने को भले ही कुछ नहीं पर उसके पास अच्छी सोच, दुसरो के लिए भलाई, बहादुरी,तेज दिमाग और एक बड़ा अच्छा दिल है। वो चाहे फिल्मी हीरो की तरह दिखता न हो पर असल ज़िन्दगी में वो एक हीरो ही है। असली हीरो। जिसने अपनी बहादुरी से एक नन्हे से पिल्ले की जान बचायी है। तभी देव ने फ़ैसला किया आगे से वो कभी अपने को कम नहीं समझेगा और न ही कभी ख़ुद की तुलना उन लड़कों से करेगा।


THE END
~'~hn~'~

Note : यह कहानी मैंने उन तेज bike चलने वालो को एक सीख देने के लिए लिखी थी कि ज़रा सी मस्ती, ज़रा सा स्टाइल, लड़कियों को दिखाने या पटाने  के चक्कर में वो न जाने कितने मासूम जीवों की जिंदगियां सड़क दूर-घटनाओं में ख़त्म कर देते है। और देव जैसे लोग सचमूच के देवता बन कर जीवों की जिंदगियां बचाते है। सच में देव उस puppy और उसकी माँ के लिए एक देवता, एक मसीहा ही तो बन कर आया था। या फिर देवता ने अपना दूत बना कर उसे वहां भेजा था।

Note : एक सीख और मिलती है इस कहानी से की हमें कभी भी अपनी सभ्यता अपने संस्कारों को नही भूलना चाहिए। दुसरे लोगो की हाव भावः देख कर या उनके चाल ढाल देख कर हमें कभी बिना सोचे समझे उन जैसी नक़ल नही करनी चाहिए। दुसरो की सही आदतों को अपनाना चाहिए फैशन और स्टाइल के नाम पर कुछ भी ऐसे ही नही अपनाना चाहिए।  हमेशा यह याद रखना चाहिए ऊपरी पहनावे और दिखावटी चाल से किसी भी इंसान के अंदर नहीं  झाँका जा सकता ,यह नहीं बताया जा सकता  कि उसके दिल में क्या है , उसकी सभ्यता कैसी है ,उसके विचार कैसे है और उसके संस्कार कैसे है.। 

~'~hn~'~

Note : This story is only a Fiction, not real story, It is only for inspirational.

Wednesday, March 23, 2011

गोरैया चिड़िया


भोर भये घर की चोखट पर
गोरैया रानी चहचहाती थी |
याद है मुझे जैसे वो हमको 
सुबह हो गयी ये बताती थी ||




सच कहूँ तो तुम्हारी वो चंचलता
मुझको सदा से ही भाती थी |
हाँ माँ को थोड़ी होती आपति
कि क्यूँ तुम इतना शोर मचाती थी ||



 



रोज़ आँगन में तुम कभी सुखी मिटटी
तो कभी बारिश के बचे पानी में नहाती थी |
कभी तुम्हे मैं तिनका तिनका जोड़ने के
जज्दोजहत में लगी हुई यहाँ वहां पाती थी ||




 
 कौन चिड़िया है कौन चिड़ा 
यही मैं कभी न समझ पाती थी |
फिर माँ की ओर देख मैं किंचित मन से
बस यही पूछती ही रह जाती थी ||




बचपन के वो उदास अकेली आलसी
गर्मियों की छुट्टी तुम्हारे संग ही तो कट जाती थी |
तुम ही थी मेरी संघी साथी आँगन में 
तुमसे ही तो मैं दौड़ लगाती रह जाती थी ||





माँ और मैं होते थे परेशान जब माँ के 
सुखाने को रखे अनाज को तुम चुगने आ जाती थी |
याद कर दादा जी के खाने की थाली का 
पहला टुकड़ा तुम ही तो खा जाती थी ||





आँगन में घोंसला बनाती जब 
तुम चोंच में तिनका दबाये आती थी |
बड़ी खिड़की हो या छोटा जंगला 
हर तरफ मैं तुमको पाती थी ||







पर तुम कम ही दिखती है
क्या भूल गयी है यहाँ का रास्ता |
हाँ मालूम है अब वो खुला आँगन 
नहीं न ही खुली हवा का कोई है पता ||






सुना है तुम अब विलुप्त होने वाली 
जातियों में गिनी हो जाती |
मनुष्य के ही फेलाये प्रदुषण
में तुम घुट सी हो जाती ||





तुम मुझको तो सदा ही याद रहोगी
बचपन की यादें ऐसे ही नहीं जाती |
और एक टोली भी है जो तुमको याद कर 
तुमको बचाने की मुहीम है चलाती || 






उम्मीद करती हूँ तुम एक बार फिर 
दिखोगी मुझे मेरे चोखट पर चहचहाती |
और मिलूंगी एक दिन मैं तुम्हे 
अपने बच्चो को तुम्हारी कहानी सुनाती ||
~'~hn~'~

How lonely I am here..


I am here, where you are,
Just here and there...
I hope you miss me there,
I miss you a lot here...
Randomly I go there from here,
I will be on time there...




Whenever I feel lonely,
You are always be near...
Whenever I think you are lovely,
I just like you more my dear...
Whenever I do not found you here,
I feel lot of fear...
Whenever I meet you,
I feel my life is on the fivth gear...



You are always with me,
That is for sure...
I want to tell you,
This feeling is so pure...
Whenever I am fed-up of all the things here,
I know only you can cure...
Wherever I will go, you know and I know,
I am always be your...



Wow I have written a poem,
Right now right here...
Its lovely that though you are not here,
But can read me direct from there...
Just writing message to you,
I am sound like poetess here...
I think you got me right there,
How lonely I am here...
~'~hn~'~

Saturday, March 19, 2011

"निम्मो बुआ" (part 6) (last part)

क्षितिज ने सीमा को बताया की दोनों बच्चे माँ के साथ उनके कमरे में सोने चले गए है.......तब सीमा drawing room में गई...रमेश सीमा को देख कर मुस्कुराया...और खुश हो कर बोला..."सीमा क्या है!... जबसे हम आए है तब से रसोई में ही हो.....अरे थोड़ा बैठ कर बातें तो करो ना....खाना वाना बाद में हो जाएगा"

सीमा बड़ी हैरान हुई..की रमेश को खाना वाना बाद में चलेगा..वो तो हमेशा से ही जब अपने मामा के घर आता था..उसको सबसे पहले खाना चाहिए होता था...हमेशा सीमा की माँ से कहता था...मामी खाना लगा दो बहुत भूख लगी है..आज उसे क्या हो गया है?

निम्मो बुआ बोली...."सीमा बेटी....तुमसे मिलना ही कहाँ हो पाता है...कितने सालो बाद मिली हो.....तुम्हारे बच्चे भी कितने सुंदर है....बिल्कुल तुम्हारी तरह लगते है दोनों...जैसे तुम बचपन में थी"
तभी रमेश बोला..."हाँ माँ देखो पीयूष तो बिल्कुल अमन जितना है...फिर भी कितना होशियार है बिल्कुल सीमा की तरह...अमन मेरा बड़ा बेटा है सीमा...मैं अभी जीजा जी को बता ही रहा था की अमन भी पीयूष के जितना बड़ा है...बहुत शैतान है...पढ़ाई का नाम ही नही लेता बस खिलवा लो जितना मर्ज़ी..."
 
तभी क्षितिज का मोबाइल फ़ोन बजा..और क्षितिज drawing room से उठ कर फ़ोन पे बात करने चला गया..अब रूम में सिर्फ़ निम्मो बुआ, रमेश और सीमा ही थे...निम्मो बुआ बोली.."सीमा हम लोग यहाँ राकेश की शादी का निमंत्रण पत्र देने आए है...यह लो....25 दिन बाद शादी है...तुम क्षितिज, अपनी साँस और बच्चो के साथ ज़रूर आना.."

सीमा अचानक से खड़ी हो गई और हाथ जोड़ कर बोली.."बुआ हमें माफ़ करे हम शादी में नही आ पाएंगे.."निम्मो बुआ.."क्यों बेटी..." सीमा उनको बीच में ही टोकते हुए बोली.."अभी मेरी बात पूरी नही हुई है बुआ जी"....तभी क्षितिज भी वापस रूम में आ गया था...सीमा फिर बोली.."हम यह निमंत्रण पत्र भी नही ले सकते बुआ जी.."

रमेश बोला.."क्यूँ ऐसा क्या हुआ सीमा.."......"तुम जानते हो ऐसा क्या हुआ..रमेश...क्षितिज भी सब जानते हैं....उनसे मैंने कुछ नही छिपाया है.....रमेश...तुम लोग बार बार आ कर मुझे वो करने को क्यों मजबूर कर रहे हो जो मैं नही करना चाहती हूँ...."

"तुम कैसी बातें कर रही हो बेटी...राकेश की शादी है हम तो तुमको खुशी से अपनी इस खुशी में शामिल करना चाहते है..."..निम्मो बुआ बोली.....निम्मो बुआ थोड़ा घबरा ज़रूर रही थी...शायद यह जान कर की क्षितिज को सब पता है..उनको शर्म आ रही थी...या फिर कोई और डर....

"बुआ आप लोग क्यों नही समझते जो राकेश ने किया उसके लिए मैं कभी भी उसे चाहते हुए भी माफ़ नही कर पाऊंगी..." सीमा बोली ...."बुआ जी यह आप भी जानती और मैं भी की उस दिन जो मैंने किया बिल्कुल ठीक किया....अगर मैं चुप रहती तो मुझे कितना कुछ अकेले ही सहन करना पड़ता....मगर बुआ जी..सब कुछ बोलने के बाद भी मुझे बार बार उसी बात को महसूस कराया जाता है...जब भी आप या रमेश मेरे सामने आते हैं तो मैं फिर वहीँ पहुँच जाती हूँ.."

सीमा रो ही पड़ी थी..क्षितिज ने उसे थाम लिया था..फिर रमेश की ओर देख कर सीमा बोली......"रमेश तुमको तो हमने पहले ही सब बता दिया था की अब हम तुम लोगो से कोई रिश्ता नही रखना चाहते..तो क्यों बार बार घर आ कर तुम रिश्ता बनाना चाहते हो...आप लोगो के बार बार सामने आने से मुझे बार बार उस दौर से, उस दर्द से गुज़रना पड़ता है...मैं कभी भी उस बात को नही भूला सकती..."

"क्या जो हुआ उस से सिर्फ़ राकेश को सज़ा मिली है...नही...बल्कि हम सबको कहीं न कहीं कितने रिश्तो नातों को तोड़ना पड़ा है...तो क्या गलती सिर्फ़ राकेश की थी...नही बल्कि गलती औरो की भी थी...."

निम्मो बुआ और रमेश दोनों एकदम shock हो गए..कमरे में कुछ देर तक सनाता छा गया था....

"बुआ जी आपकी गलती..कि आप इतने सालो तक फूफ्फा जी डांट और मार सह रही है...मानती हूँ सहन करना अच्छी बात होती है....मगर जरूरत से ज्यादा सहन करना भी दुसरे को और ताकत देना है.....अत्याचार करने वाला और अत्याचार सहने वाला दोनों गुन्हेगार होते है....और रमेश तुम.....बुआ ही नही तुम ने भी कभी फूफ्फा जी को यह एहसास नही कराया कि....तुम पर ,तुम्हारे भाइयो पर और तुम्हारी माँ पर कितना जुल्म कर रहे है वो..रमेश तुम तो बस डरते रहे....तुमसे इतना नही हुआ की जब तुम बड़े हो गए..कमाने लगे तुम अपने पापा को यह बता सको कि बस अब बहुत हुआ"

"अब आप बताइए जिस लड़के ने बचपन से लेकर सिर्फ़ अपने घर में अपनी माँ, एक औरत को लाचार और चुप चाप सहने वाली एक कटपुतली की तरह देखा..जिसने अपने बड़े भाई को डरा हुआ देखा...वो बच्चा ख़ुद कितना डरा हुआ होगा...और लड़की की ओर उसकी सोच क्या रह जायेगी...कि लडकियां तो बहुत कमज़ोर और अत्याचार सहने वाली होती है...उन पर कितना भी अत्याचार हो वो कभी आवाज़ नही उठाती....ऐसे माहोल में पलने वाला बच्चा यह सब नही करेगा तो क्या करेगा..."

"अगर बुआ जी आप फूफ्फा जी के ख़िलाफ़ उस वक्त कुछ करती जिस दिन उन्होंने सब हद पार कर दी थी...या आप उनसे अलग भी हो जाती....मगर आपको आपके बेटे ऐसे दिन नही दिखाते...भले ही उन्हें अपने पापा की कमी खलती मगर वो उस डर और दहशत में नही जीते...जिस में आप साँस लेती आई है..."

"यह तुम क्या कहे जा रही हो सीमा बेटी.."...निम्मो बुआ बोली...

"क्यों क्या मैंने कुछ ग़लत कहा है...तुम बताओ रमेश क्या मैंने कुछ ग़लत कहा है..." सीमा की आवाज़ ऊँची हो गई थी.....सीमा अब क्षितिज के पास से आगे आकर रमेश की आँखों में आँखें डाल कर बात कर रही थी....

"तुम तो जानते हो रमेश की तुम्हारे मामा..... मेरे पापा और मेरे परिवार ने कितना कुछ सहा है...तुम बताओ अगर तुम लोग एक बार कड़क दिल कर कोई फ़ैसला लेते तो क्या हम लोग तुम लोगो की मदद नही करते...मगर तुम लोगो को तो डर में जीने की सी आदत हो चुकी थी..."

"मैं अब बस यही चाहती हूँ की अब आप लोग मुझसे कोई उम्मीद न रखे....न तो मैं यह invitation ले पाऊंगी और ना ही शादी में आऊंगी......अब आप लोगो से कोई वास्ता रखना ही नही चाहती मैं...बस बहुत सह लिया..बहुत जी लिया वो दिन मैंने बार बार..अब नही..अब मैं अपने पति के साथ बिना किसी दर्द के, बिना किसी डर के रहना चाहती हूँ..आप हमें माफ़ करे...." सीमा ने दरवाजे की ओर इशारा कर दिया।

निम्मो बुआ और रमेश भी समझ गए थे.....और वो लोग भी दरवाजे की ओर चल पड़े...

उनके जाते ही सीमा ज़ोर ज़ोर से रोने लगी...क्षितिज ने उसे अपना सहारा दिया...."क्षितिज तुम्हारी वजह से इतना कुछ कह पायी मैं आज...वरना यह बातें दिल ही में रह जाती...हमेशा....इतनी हिम्मत नही थी मुझ में... यह सब तुमने मुझसे करवाया....पता नही मैंने यह ठीक किया या ग़लत।"

"तुम्हारा कोई ही फ़ैसला होता मैं तुम्हारा साथ देता...जैसे अभी दे रहा हूँ.." क्षितिज ने बस इतना ही कहा।

THE END
~'~hn~'~

Note : This story is only a Fiction, not real story, It is only for inspirational.

Friday, March 18, 2011

"निम्मो बुआ" (part 5)

सीमा रसोई में आ कर उनके लिए cold drinks और snacks तैयार करने लगी...क्षितिज भी रसोई से सामन ले जा कर उनकी आव-भगत करने लगा...सीमा उनके सामने नही जाना चाहती थी...इसलिए वो क्षितिज से ही काम करवा रही थी...थोड़ा नाश्ते के बाद सीमा उनके लिए खाना तैयार करने लगी....सीमा की जैसे सोचने की शक्ति ही चली गई थी...उसे समझ नही आ रहा था की वो क्या करे..उनको कैसे face करे...क्यों वो उनसे दूर भाग रही थी उसे ख़ुद नही मालूम था..आख़िर सीमा ने कुछ भी ग़लत नही किया था..फिर क्यों वो उनसे नज़र चुरा रही है...पता नही सीमा को क्या बेकार की बातें तंग कर रही थी...उसको यह सोच कर भी डर लग रहा था...की उसकी सास यह सब सुनेगी तो क्या बोलेगी..अभी तक तो सीमा उनकी चहिती बहु है...उनको पता चला तो क्या होगा...????

सीमा यह सब सोच रही थी की उसके कंधे पे किसी ने हाथ रखा...सीमा यह सब सोच कर पहले ही डरी हुई थी..इस बात से वो और डर गई...उसने पीछे मुड कर देखा तो क्षितिज था...सीमा ने एक लम्बी और गहरी साँस ली...."क्या हुआ सीमा..तुम डर क्यों गई"..क्षितिज ने पुछा..."कुछ नही..." सीमा ने जवाब दिया...क्षितिज फिर बोला.."चलो वो लोग तुम्हे बुला रहे है....."...सीमा बोली " मुझे खाना तैयार करना है.."..क्षितिज ने बहुत धीमी आवाज़ में कहा.."क्या हो जाता है तुमको..मैंने तुम्हे कितनी बार बोला है वो एक पुरानी बात है...तुमको समझना चाहिए की तुम कितनी अलग तरह से behave करने लगती हो...आखिर problem क्या है.." सीमा बोली "क्षितिज मैं ख़ुद नही जानती...यह सब मैं क्यों करती हूँ...बस..मुझे उनके सामने जाना अच्छा नही लगता..i m feeling very uncomfortable..."


क्षितिज "ह्म्म्म्म"...कुछ सोच कर फिर बोला.."देखो सीमा मैंने तुमको इस बारे अपनी राये कभी नही दी...कभी नही कहा की राकेश को माफ़ करो..या उसको सज़ा दो...हमेशा सोचा की तुम इस सबको handle कर लोगी...but अब नही मुझे तुमको बताना होगा की तुम दो नावों पे सवार हो....न तो तुम राकेश को माफ़ करना चाहती हो और न ही तुम उसको कोई सज़ा दे रही हो....देखो सीमा अगर कोई नदी में बीच मझधार में डूब रहा है..तो उसे यह सोच कर की नदी के बहाव में वो कभी न कभी तो नदी के किसी न किसी किनारे पहुँच ही जाएगा अपने आपको इस तरह नदी के बहाव के हवाले नही करना चाहिए.....बल्कि उसे दोनों में एक किनारा जो उसको करीब लगता हो उस तरफ़ जाने की कोशिश करनी चाहिए...या तो इधर या फिर उधर......इस फैसले पे ही उसे अपनी पूरी जान लगानी चाहिए फिर उसे अपने आप रास्ता मिल जाएगा..और वो किसी न किसी किनारे तक जो कि उसके बहुत करीब है पहुँच ही जाएगा...बीच मझदार में फसे रहने से तो वो डूब जाएगा...तुमको भी एक किनारा सोचना ही पड़ेगा...तुम पास वाले किनारे तक पहुंचने की सोचो तो सही..फिर देखना तुम्हे उस किनारे तक कैसे पहुँचना है अपने आप पता चल जाएगा...रास्ता अपने आप सामने आएगा सीमा.."


क्षितिज का इतना बोलना था...सीमा में अचानक न जाने कहाँ से एक नई शक्ति की लहर आ गई...अब उसे साफ़ साफ़ नज़र आ रहा था की उसे क्या करना है...उसके चेहरे पे ही अजीब सा तेज था..एक नया आत्मविश्वास उसके चेहरे से झलक रहा था...

क्षितिज भी उसके चेहरे पे यह सब पढ़ चुका था....और समझ चुका था की सीमा ने कोई बड़ा फ़ैसला तो ज़रूर ले लिया है...इसलिए वो चुप चाप रसोई से चला गया....

to be continue....
~'~hn~'~

Note : This story is only a Fiction, not real story, It is only for inspirational.

Thursday, March 17, 2011

"निम्मो बुआ" (part 4)

सुबह के 9 बज चुके थे....आज सीमा को देर हो गई थी नाश्ता तैयार करने में...वो देर से जो उठी थी....क्षितिज ने भी उसे उठाया नही था.... और वो jogging के लिए चला गया था.. क्षितिज जानता था.. वो रात को देर से सोयी थी.. इसलिए उसने उसे उठाया नही था....क्षितिज jogging से आने के बाद सीमा की रसोई में मदद करने लगा...क्षितिज बहुत ही अच्छा पति था... सीमा के मन में कब क्या चल रहा होता है वो उसे सीमा के बिना कहे ही समझ आ जाता था..... इसीलिए तो जब भी सीमा को उसकी मदद की ज़रूरत महसूस ही होती तभी क्षितिज उसके सामने होता..और मदद करने को तत्पर रहता....

सबका नाश्ता होने बाद... सीमा और क्षितिज नाश्ता करने लगे... क्षितिज ने सीमा को अपने एक project के बारे में बताया.. और उसकी advice भी मांगी.. सीमा को पता था क्षितिज उसका ध्यान उन बातों से दूर करने के लिए यह सब कर रहा है... सीमा ने उसे दो तीन बातें बताई...और कुछ advice भी दी... फिर क्षितिज ने अपने ऑफिस के कुछ किस्से भी सुनाये....

11 बजे तक सीमा का सब काम ख़त्म हो गया था...सीमा drawing room में आके बैठ गई....क्षितिज भी पास बैठ कर laptop पे अपना कुछ काम कर रहा था...सीमा फिर से सोचने लगी सीमा का स्कूल और कॉलेज सब co-ed में हुआ था..राकेश हमेशा से boys स्कूल में पड़ा था वो लड़कियों के साथ बात नही कर पाता था... काफ़ी चुप चाप रहता था लड़कियों के बीच..

उस दिन भी वो चुप ही था...चुप चाप TV देख रहा था..सीमा भी TV के channels बदल बदल कर songs सुन रही थी....साथ ही साथ गा भी रही थी...उसने राकेश की और देखा...फिर ना जाने राकेश को क्या हुआ..वो सीमा की और जल्दी से लपका...उसने सीमा के दोनों गालो पे अपने दोनों हाथ रख दिए और अपना मुह उसके मुह के बिल्कुल सामने ले आया..सीमा कुछ समझ पाती की यह क्या कर रहा था..इतने में राकेश ने उसके होठो को अपने होठो से मिलाने की कोशिश की...उस वक्त सीमा बहुत कमज़ोर महसूस कर रही थी मगर फिर अचानक ना जाने उसमें अजीब सी शक्ति आ गई...उसने TV remote जो की उसी के हाथो में था ज़ोर की राकेश के मुह पे दे मारा....राकेश भी झून्झला उठा..सीमा ने उसको थोड़ा और ज़ोर की remote मारा... फिर अपने दोनों हाथो से उसके गालो में दो चार चांटे लगा दिए...राकेश और सीमा कुछ देर के लिए शांत हो गए.. फिर राकेश बोला..."i m sorry...सीमा...मुझे पता नही क्या हो गया था...बहन..i m sorry.."

सीमा की आँखों से ज़ोर ज़ोर से आंसू निकल रहे थे..वो समझ नही पा रही थी यह क्या हुआ और क्यूँ हुआ....शायद जो हुआ था उसका मन और दिमाग दोनों ही उसे स्वीकार नही कर रहे थे.....वो राकेश की और देखने लगी...कुछ न कह कर भी उसकी आँखें राकेश से यह सवाल ज़रूर कर रही थी की यह क्या था...क्यूँ किया उसने ऐसा..वो तो उसे हमेशा छोटा भाई समझती थी..वो ऐसा कैसे कर सकता है अपनी ही बहन के साथ...और sorry कहने से क्या सब कुछ ठीक हो जाएगा....उसके मुह से sorry सुन कर सीमा को और गुस्सा आ रहा था...उसे घृणा सी हो रही थी उस से...

राकेश की आँखों में भी आंसूओं और डर दोनों साफ़ साफ़ नज़र आ रहे थे सीमा को...राकेश बोला.."बहन किसी को मत बताना..जो हुआ उसे भूल जाओ...मुझे भी नही पता की यह कैसे हुआ..शायद पढ़ाई का pressure था या कुछ और..मुझे नही मालूम...sorry...तुम चाहो तो मुझे खूब मार लो..पीट लो...पर please यह बात किसी को नही बताना..मैं अब भी तुम्हे उसी तरह बहन मानता हूँ...तुम भी मुझे भाई ही मानना..." राकेश की जैसे हवायिआं ही उड़ गई थी.

सीमा को पता नही क्यों उसकी किसी भी बात पर विश्वास नही हो रहा था.....वो उसे और ज्यादा ज़ोर की मारना पीटना चाहती थी.....सीमा चुप चाप वहां से उठ कर रसोई में चली गई...रसोई में ज़ोर ज़ोर से रोने लगी...तभी उसकी माँ घर आ गई...सीमा ने जल्दी से आंसू पूछे...सीमा की माँ बोली.."सीमा मैं ice cream लायी हूँ खा लेना...अरे तुमने अभी कुछ भी नही किया..बोलके तो गई थी बाकी का काम कर लेना..तुम भी न सीमा...हे भगवान् TV के आगे कुछ नही करती यह लड़की.."....सीमा चुप चाप काम करने लगी....

सीमा की माँ राकेश को ice-cream देने चली गई..और इधर सीमा सोचने लगी... "की जो हुआ वो उसे माँ को बताना चाहिए की नही...सोचते सोचते सीमा न जाने कहा तक पहुच गई...फिर उसको ध्यान आया की राकेश की करतूत न बता कर शायद सीमा राकेश का होसला बड़ा रही है...राकेश तो उसके चाचा के यहाँ भी आता जाता है और वहां भी उसकी दो छोटी बहने है....सीमा को उनकी चिंता होने लगी..क्या पता यह सब उनके साथ भी...नही नही...मुझे माँ को बताना चाहिए..और कल नही अभी इसी वक्त इस राकेश के सामने ही...ताकि राकेश का सच सामने आए..."

सीमा सब काम छोड़ कर माँ और राकेश के पास गई...वो राकेश को घूरने लगी...सीमा की माँ ने कहा.."क्या हुआ..." सीमा ज़ोर ज़ोर से रोने लगी...उसकी माँ ने फिर पुछा.."क्या हुआ..रो क्यों रही हो.."....सीमा ज़ोर से चिल्लाई.."इसी से पूछो इसने क्या किया है..."..राकेश सर झुकाए बैठा रहा...माँ भी परेशान हो गई....और राकेश की और देखने लगी...जब काफ़ी देर तक राकेश न नही बताया तो ..सीमा ने रोते रोते माँ को बता दिया....राकेश की ओर देख कर कहा.."मैं नही बताती तो तुम्हारी हिम्मत और बढ़ जाती और तुम मेरे साथ या किसी और के साथ फिर ऐसा कुछ करते..."....राकेश सीमा की माँ के सामने गिडगिडाने लगा..."मामी मुझे माफ़ कर दो...मुझे पता नही क्या हो गया था.."

सीमा की माँ भी सदमे में थी..कुछ बोल नही पा रही थी...बस इतना ही बोला.."अगर तेरे मामा यहाँ होते तो तुझे जेल की हवा लगवा चुके होते..."..सीमा बोली.."माँ इसको बोलो यह अभी के अभी यहाँ से चला जाए और फिर यहाँ कभी न आए..."...सीमा की माँ ने राकेश को बोला "मुझे पता नही क्या करना चाहिए...बस अभी काफ़ी रात हो चुकी है इसलिए तुम जा कर सो जाओ...और सुबह सुबह ही यहाँ से चले जाना..."...राकेश चुप चाप चला गया....सीमा की माँ ने सीमा को कहा "मेरा मन कर रहा है इसको घर से बहार निकल दू...मगर आज न तेरे पापा यहाँ है न तेरे भाई.."

अगले दिन सुबह सुबह ही राकेश चला गया....रात भर सीमा को डर लगता रहा..वो सोचती रही..सो नही पायी थी वो ठीक से....दोपहर को उसके पापा आ गए....उसके लिए gift ले कर आए थे..सीमा नए कपड़े पहन रही थी...तभी उसकी माँ ने उसके पापा को सब कुछ बताया...फिर सीमा के पापा ने उसे उसका gift दिया और बोला सब भूल जाओ...बस आगे से उनसे हमारा कोई रिश्ता नही है...

धीरे धीरे यह बात सब रिश्तेदारों के यहाँ पहुच गई...सीमा के पापा ने फ़ैसला कर लिया था..की अब उनका रिश्ता वैसा नही रहेगा...सीमा जानती थी पापा सबके सामने नही बोल पा रहे है..मगर उनको बहुत गुस्सा आ रहा है...निम्मो बुआ कई बार बात करने सीमा के घर आई...शायद उनको इस सब पर यकीन नहीं था...मगर जब माँ ने उनको बताया की राकेश ने ख़ुद अपने आप यह बात कबूली थी उनके सामने..तब निम्मो बुआ को मानना पड़ा...

सीमा के भाई सूरज जब college tour से घर वापस लौट के आया तो सीमा ने उसको ख़ुद दो चार दिन बाद यह बात बताई.....सूरज को भी बहुत गुस्सा आया.."हम लोग उनको कितना भाई भाई करते है..और उनके दिलो में ऐसा कुछ है...कितने काले दिल के है यह लोग.. उनकी अपनी कोई बहन नही है..तो किसी की भी बहन की कोई इज्ज़त नही..."...सीमा बोली.."आगे से उनसे हमारा कोई वास्ता नही..बस यही एक सज़ा है....उनके लिए...".सीमा को उस वक्त भी बहुत गुस्सा आ रहा था...

फिर एक दिन रमेश सीमा के घर आया...तब सूरज ने उस से साफ साफ़ कह दिया.."अब तुम हमसे पहले की तरह रिश्ते की उम्मीद मत रखो..हम यह सब सहन नही करने वाले..उस दिन पापा और हम नही थे इसलिए वो जेल जाने से बच गया.." रमेश कुछ बोल नही पा रहा था...चुप चाप सुनता रहा..

अब भी अक्सर रमेश सीमा के घर आता..मगर यहाँ उस से कोई ठीक से बात नही करता था...फ़ोन पे बातें तो पहले ही बंद हो गई थी...किसी के यहाँ भी किसी की खुशियों में या किसी भी occassion पर कहीं सभी रिश्तेदार मिलते तो..निम्मो बुआ के परिवार से सीमा का परिवार कोई भी बात नही करता था...जहाँ तक हो सके निम्मो बुआ के परिवार से आमना सामना न हो इस बात का ख्याल हमेशा सीमा का परिवार रखता था....राकेश का तो कहीं आना जाना बंद हो ही गया था...अब वो बस आपने घर में ही रहता था....शायद निम्मो बुआ ने ही उसे कहीं जाने को मना किया हुआ था..या वो ख़ुद ही कहीं आता जाता नही था....उसे भी शायद पता था की जो उसने किया बहुत ग़लत किया....

सीमा की शादी,रमेश,राकेश,सूरज और नील की शादी.. सभी की शादियों में भी बस सब एक दुसरे को चुप चाप देखते रहते..आंखों में कई सवाल लिए..मगर होठो को तो जैसे किसी ने सिल दिया हो...सीमा तो उनके किसी भी function में नही गई थी.....शादी के बाद तो वैसे भी नही...क्षितिज को भी उसने शादी के कुछ दिनों बाद ही बता दिया था की उनका और सीमा की परिवार में बहुत सारी problems है...और सीमा के साथ जो हुआ वो भी क्षितिज को पता था...सीमा ने क्षितिज को सब बताया था....सीमा अंदर ही अंदर कभी कभी सोचती थी...की राकेश की गलती की सज़ा क्या उसके पुरे परिवार को देना ठीक है...क्या निम्मो बुआ, रमेश और राजेश का कोई कसूर है जो उनको सज़ा मिल रही है....क्या राकेश की गलती माफ़ी के लायक थी....क्या उसे बाकिओं को माफ़ कर देना चाहिए...

ting...tong..ting...tong..घर की घंटी की आवाज़ ने सीमा को उसकी सोच की गहराईओं से बाहर निकाला....करीब 1 बज चुका था...क्षितिज ने दरवाजा खोला.."नमस्ते...आईएं ना..." क्षितिज ने कहा। सीमा ने देखा निम्मो बुआ ही थी..बहुत ही थकी हुई और बूढी लग रही थी...साथ में रमेश भी था....सीमा ने भी दोनों हाथ जोड़े और सर हिलाया...निम्मो बुआ ने भी सर हिला कर और मुस्कुरा कर जवाब दिया...सीमा से वहां खड़ा नही हुआ जा रहा था...इसलिए वो कुछ मिनटों बाद ही रसोई में चली गई...

to be continue....
~'~hn~'~

Note : This story is only a Fiction, not real story, It is only for inspirational.

Wednesday, March 16, 2011

"निम्मो बुआ" (part 3)

निम्मो बुआ और उनके परिवार के बारे में सीमा जितना सोचती थी उतना कम था....रमेश उनका बड़ा बेटा सीमा के दोस्त जैसा था...बहुत सीदा साधा..और बहुत intelligent भी...ambitious तो था ही....मगर उसके पापा..यानि सीमा के फुफ्फाजी हमेशा उसे बिना बात के डांटते फटकारते रहते थे...रमेश बहुत ही अच्छा लड़का था...सीमा के घर में सब उसे पसंद करते थे....रमेश भी अपने मामाओं और मौसियों के बहुत करीब था..उसको जो प्यार उसके पापा से नहीं मिलता था वो प्यार वह यहाँ अपने ननिहाल में दूढ़ता था...उसकी दादी भी उसे उतना ही प्यार करती थी..मगर वो गाँव कम ही जाता था..सीमा को यह नहीं पता था..की आखिर क्या कारण था..जो रमेश अपने दादा-दादी को पसंद नहीं करता था...

शायद उसका उसके पापा के उपर जो गुस्सा था वो ही उसे उसके दादा और दादी से दूर रखता था...खैर..सीमा और रमेश की पढ़ाई साथ साथ होती थी...कभी सीमा उनके घर चली जाती थी कभी रमेश आ जाता था सीमा के घर...दोनों मिलजुल के पढ़ते थे...सीमा भी पढ़ाई में तेज थी...मगर जहाँ बढों से बढों की तरह बात करने की बात आती तो रमेश हमेशा से ही बढों जैसी समझदारी की बातें किया करता था...सीमा को तो हमेशा बच्चो जैसा प्यार ही मिलता..क्योंकि वो बहुत चचल थी...उसका दिल हमेशा बच्चो जैसा था...सीमा समझदार थी पर वो किसी से समझदारी वाली बातें नहीं किया करती थी.....वो सब समझती थी...वो अपने पाप की समझदारी वाली बातें सुन सुन कर ही तो बड़ी हुई थी...अक्सर सीमा के पापा उस से समझदारी वाली बातें किया करते थे...पर वो तो बच्चो की तरह ही अपने पापा से बात करती थी...कभी कुछ भी दिल में आया और पापा या माँ से मांग लेना..अब वो उसे मिले या न मिले...सीमा के पापा हमेशा उसकी हर ख्वाइश देर सवेर पूरी करते थे....सीमा अपने पापा की आर्थिक स्तिथि को देख कर ज्यादा जिद्द नहीं करती थी.....पर हाँ जो दिल में होता था..की यह चाहिए वो चाहिए बोल देती थी...उसे अपने पापा पे जो पुरा विश्वास था की जहाँ तक उसके पापा से हो सकेगा वो ज़रूर करेंगे...कभी न कभी वो चीज़ ज़रूर उसे मिलेगी...सीमा ने जब schooling ख़त्म की तब उसने पापा से कंप्यूटर माँगा...और उसके पापा ने 6 महीनो बाद ही उसको कंप्यूटर ला कर दे दिया...सीमा के भाई उस से इस बात पर चिढ गए थे..की उसकी हर मांग पूरी होती है..और वो कबसे bike के लिए पापा से बोल रहे है..पर पापा हर बार टाल देते थे..खैर रमेश भी उन् दिनों कॉलेज में ही पढ़ाई कर रहा था..वो कॉलेज के बाद tutions देने लगा...

सीमा को आज भी याद है जब उसकी निम्मो बुआ जी ने सीमा के घर फ़ोन किया था...सीमा ने ही फ़ोन उठाया था..बुआ ने बताया की रमेश बिना बताये कहीं चला गया है...शायद किसी दोस्त के घर...उसका tutions देना उसके पापा को पसंद नहीं था...उसके पापा को लगता था वो अपने दोस्तों के साथ कॉलेज के बाद मज़े करता है...और इस बात पर कई बार उसके पापा से उसकी कहा सुनी हो जाती थी...बुआ जी बहुत परेशान थी...किसी को नहीं पता था की रमेश कहाँ गया हुआ है...

फिर एक दिन सीमा के घर उसके सबसे छोटे चाचा का फ़ोन आया की उनको रमेश का फ़ोन आया था...वो अपने किसी दोस्त के साथ रहता है..उसने अपने पापा को बताने को मना किया था..बस उसकी माँ यानि निम्मो बुआ परेशान न हो इसलिए यह बताने के लिए फ़ोन किया है की वो ठीक ठाक है...फ़िक्र न करे....तब सीमा के पापा ने सीमा के चाचा को बोला की अगली बार अगर उसका फ़ोन आए तो उसे यहाँ सीमा के पापा के पास फ़ोन करने को कहना....

सीमा के पापा को पता था की ऐसी उमर में बच्चो से दोस्तों की तरह ही बात करनी चाहिए...एक दो बार रमेश ने अपनी माँ से फ़ोन पर ही बात की...मगर यह नहीं बताया की वो कहाँ है....फिर एक बार रमेश ने सीमा के घर फ़ोन किया...सीमा के पापा ने उस से बात की...उसे कुछ पैसो की ज़रूरत थी...सीमा के पापा न कहा "रमेश बेटे तुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था..अगर कोई पेरशानी थी अपने घर पे तो तू यहाँ आ जाता..मगर बिना किसी को  बताये कहीं किसी और अनजान व्यक्ति के पास रहना अच्छा नहीं"...रमेश ने बोला "मैं अब अपने पापा के साथ नहीं रह सकता"..तब सीमा के पापा ने कहा "तू अपनी माँ और छोटे भाइयो का सोच उन् पर क्या बीत रही है...तेरी माँ को तेरी कितनी चिंता है"...फिर सीमा के पापा ने उसे घर बुलाया और उधर निम्मो बुआ को भी बुला लिया..निम्मो बुआ फुफ्फाजी को बिना बताये आ गई..दोनों माँ बेटे मिले...माँ ने बेटे को कुछ पैसे दिए और कहा "तू जहाँ रहना चाहता है रह..मगर मुझसे दूर मत जा..मुझे तो तस्सली रहे की तू ठीक है"....इस पर सीमा के पापा ने कहा "तू यहाँ भी रह सकता है तेरे पापा को कोई कुछ नहीं बताएगा"...

रमेश बड़ी देर बाद मान गया..और दो तीन दिनों बाद वो सामान ले कर सीमा के यहाँ आ गया...सीमा के पापा, सीमा के चाचा, सीमा की दूसरी बुआ और फुफ्फाजी, सीमा की निम्मो बुआ..सबको पता था की रमेश सीमा के घर रहता है...मगर रमेश के पापा को नहीं पता चलने दिया...

रमेश सीमा के यहाँ 1+ साल तक रहा...मगर कोई कितना रमेश के पापा से छिपा सकता था..रमेश के पापा को पता चल गया था की रमेश सीमा के यहाँ रहता है....बस फिर क्या था...जब सुबह सुबह सीमा, सीमा के भाई और रमेश सब कॉलेज और स्कूल जाने के लिए तैयार हो रहे थे...की फ़ोन की घंटी बजी..हमेशा की तरह सीमा ने फ़ोन उठाया..फुफ्फाजी(रमेश के पापा) का फ़ोन था...पूछने लगे "रमेश है न वहां...ज़रा रमेश को फ़ोन दो"....सीमा ने कहा "नहीं फूफ्फा जी वो यहाँ नहीं है"...सीमा के फूफाजी ज़ोर से चिलाने लगे...सीमा डर गई और हेल्लो हेल्लो करते करते उसने फ़ोन रख दिया...रमेश भी डर गया...फ़ोन की घंटी फिर बजी...सीमा ने फिर उठाया...उसके हेल्लो बोलने से पहले ही फूफ्फा जी बोले "तुम मुझको बेवकूफ समझते हो...रमेश वहां है मुझे पता है...उसको फ़ोन दो..."..सीमा चुप चाप सुनती रही.."तुमको सुनाई नहीं देता सीमा....रमेश को फ़ोन दो"....सीमा ने रमेश को इशारा किया...रमेश ने फ़ोन ले लिया और सुन ने लगा...सीमा ने फूफ्फा जी का ऐसा रूप पहले कभी नहीं देखा था....फिर जब रमेश के पापा शांत हुए, रमेश धीरे से बोला "पापा मैं रमेश बोल रहा हूँ बोलो...".....उसके पापा ने उसे खूब सुनाया..और कहा "अगर तू घर आना चाहता है तो अभी दो चार दिन में आजा...मैं तुझे कुछ नहीं कहूँगा...वरना मैं कुछ कर बैठुगा"..रमेश डर गया...उसने कहा "ठीक है"...

उसी दिन शाम को जब सीमा के पापा घर आए तो रमेश ने उनको बताया...सीमा को तो पूरे दिन उसकी माँ और उसके भाइयों की डांट पड़ ही चुकी थी..वो भी सिर्फ़ फ़ोन उठाने पर....सीमा को भी लग रहा था अच्छा होता वो फ़ोन उठाती ही नहीं....पर वो भी क्या करे उसे ही हमेशा फ़ोन उठाना पड़ता था...कोई और फ़ोन उठाता भी नहीं था...वो नहीं उठती तो कोई भी नहीं उठाता.....सीमा को लगा उसके पापा भी उसे खूब सुनायेंगे...पर इस पर सीमा के पापा बोले नहीं..... फ़ोन न उठाने से सीमा के फुफ्फाजी और नाराज़ हो जाते... उनका गुस्सा और बढ़ जाता...फिर सीमा के पापा रमेश से बोले.."तू देख ले बेटा अगर तुझे यहीं रहना है तो कोई बात नहीं हम तेरे साथ हैं..तू उनको बोल दे की तू यहीं रहेगा...हम हमेशा हर फैसले में तेरे साथ है..जाना चाहता है तो चला जा..."...रमेश बोला "मामा जी..पर अगर उन्होंने कुछ कर दिया तो...पुलिस में रिपोर्ट कर दी तो....फिर आप पर बात आ जायेगी अभी मैं 18 का नहीं हुआ हूँ....पापा कुछ भी कर सकते है...आप पर भी इल्जाम लगा देने से नहीं चूकेंगे वो.."..सीमा के पापा ने कहा...."हाँ अब बात तो वैसे भी मुझ पर ही आएगी बेटा कोई नहीं तू हमको प्यारा है..तू जो कहेगा हम करेंगे...हमने उनसे इतनी बड़ी बात छुपाई है..मुझे पहले ही पता था...वैसे भी वो बड़े गरम दिमाग के है....बिना सोचे समझे कुछ भी कह देते है...कुछ भी कर देते है...अब हमारा तो रिश्ता ही ऐसा है...वो दामाद है..हम तो वैसे भी सुनते है..और सुन लेंगे...उनके बच्चे को बहलाने फुसलाने का इल्जाम भी सुन लेंगे"...रमेश ने कहा "नहीं मामा जी..आप ने तो इतना साथ दिया है...मैं ही परेशानी से दूर भाग रहा था...मुझे अब उनका सामना करना ही पड़ेगा.."...तभी फ़ोन बजा..निम्मो बुआ का फ़ोन था..रमेश ने बात की.."बेटा रमेश अब तू घर आजा..नहीं तो यह आदमी न मुझे और न तेरे भाइयो को चैन से जीने देगा..पूरा घर सर पे उठा रखा है..पता नहीं क्या अनाप शनाप बोले जा रहा है...तू घर आ जा..वो तुझे कुछ नहीं कहेंगे..बस घर आजा.."

फिर रमेश ने घर जाने का फ़ैसला किया...सीमा के पापा और सीमा की माँ भी उसके साथ गए..ताकि रमेश को ज्यादा न सुन न पड़े....सीमा के पापा को रमेश के पापा ने खूब सुनाया और गन्दी-गन्दी गालियाँ दी...जो की सीमा की माँ को अच्छी नहीं लगी....पर वहां बोलने का कोई फ़ायदा नहीं था क्योंकि गलती तो सीमा के माँ और पापा की थी...उन्होंने बहुत बड़ी बात जो रमेश के पापा से छिपाई थी...और सीमा की माँ पहले से ही जानती थी की रमेश को अपने घर यूँ छिपा कर रखना ठीक नहीं था..पर सीमा के पापा के फैसले के आगे वो कुछ नहीं बोली थी..पर अब उनको लग रहा था की बोलना चाहिए था..कम से कम इतना सुनना तो न पड़ता...

सीमा की माँ घर आ कर सीमा के पापा को बोली अब वहां कोई नहीं जाएगा...आप बड़े हो और वो आपको इतना कुछ सुनायेंगे...तब सीमा के पापा बोले.."अगर रमेश अकेला जाता तो उसको खूब सुनना पड़ता..हम थे इसलिए उनका सारा गुस्सा हम पर उतर गया..."...सीमा की माँ बोली.."हाँ हमने उनको बहन दी है..गालियाँ और बातें सुन ने के लिए ..और अब हम ही गालियाँ सुने...निम्मो भी चुप चाप खड़ी थी कुछ नहीं बोली...ऐसे ही रोज़ सुनाता है क्या वो....और निम्मो को तो जैसे सुनने की आदत पड़ गई हो.....अरे यह निम्मो भी न जाने क्यों उस जैसे इंसान के साथ है..क्यों नहीं अलग हो जाती..." सीमा के पापा बोले.."वो उसका फ़ैसला है उसी पे छोड़ दो...हमें तो बस साथ देना है..."......"पर मैं नहीं सुनूंगी उनकी गालियाँ...नहीं सुनना चाहती इसलिए अच्छा होगा हम उनसे दूर ही रहे...अब उनके यहाँ नहीं जाना हमें...क्या गालियाँ ही सुनते रहे पूरी ज़िन्दगी...वैसे भी रोज़ ही सुनाता होगा गालियाँ निम्मो को...और हमें..."...सीमा की माँ गुस्से में यह भी भूल गई थी की वो उनके दामाद थे...उनका रिश्ता बड़ा था।

फिर क्या सीमा की माँ को बहुत गुस्सा था मगर रिश्तेदारी की वजह से कुछ नहीं कर सकती थी..बस अपने बच्चो और अपने पति को ही वहां जाने से मना ही कर सकती थी...सीमा को भी कॉलेज के बाद सीधे घर आने को कहती थी...कही सीमा कॉलेज के बाद रमेश या निम्मो बुआ से मिलने वहां न चली जाए..डरती थी...कुछ हफ्तों बाद रमेश उनके घर आया...सीमा की माँ ने उस से कम ही बात की...

सीमा ने जब रमेश से पुछा की अब सब वहां ठीक है की नहीं...तो वो बोला मैं यहाँ अपने पापा की गालियों की माफ़ी मांगने आया हूँ..उनकी तरफ़ से.....माफ़ कर दो...मैं नहीं चाहता यह सब हो...शायद घर से चुप चाप भाग जाना मेरा फ़ैसला ठीक नहीं था...सीमा के पापा शाम को घर आ गए...तब रमेश ने उनसे भी माफ़ी मांगी...सीमा के पापा ने कहा.."नहीं बेटा..ऐसा कुछ नहीं है... अगर तू अकेला जाता तो वो तुझ पर ही बरसते...हम थे साथ में इसलिए उनका गुस्सा हम पर उतर गया..मैं तो बड़ा हूँ..हम तो शुरू से ही सुनते आए है..और हमेशा सुनते ही रहेंगे...हमारा रिश्ता भी कुछ ऐसा है...तुम बस अब अपनी माँ और अपने भाइयो का ध्यान रखो.."

रमेश अब अक्सर चुप चुप कर सीमा के घर आने लगा...उसको यहाँ आ कर अच्छा लगता था..क्योंकि यहाँ वो जो चाहे कर सकता था...अपने घर तो वो बस बूत बन जाता था न किसी से बोलना न किसी से हसना....बस अब उसके पापा उस से सवाल जवाब नही करते थे..की तू कहाँ गया था..क्यों गया था....पर अब इस सबका असर उसके भाइयो पर हो रहा था..अब वो कहीं आ जा नही सकते थे..उसके पापा ने जो मना किया हुआ था...उनको लगता था कही उनके दुसरे दोनों बेटे भी कुछ ऐसा न करें...रमेश सभी रिश्तेदारों के यहाँ बिना बताये चला जाता था...बस रात होते ही घर चला जाता था...अपने दादा-दादी के यहाँ....अपने चाचा-चाची के यहाँ नही जाता था....जैसे उसके तो मामाओं और मौसाओं-मौसियों के इलावा कोई और रिश्तेदार हो ही नही। 

धीरे धीरे समय बीतता गया...अब सीमा B.A. के बाद M.A. के first year में थी॥ उधर रमेश भी post graduation कर रहा था...सीमा के दोनों भाई भी कॉलेज में आ गए थे...रमेश का छोटे भाई भी 11th और 12th में थे...राजेश भी एक-दो बार project कंप्यूटर पे बनाने के लिए सीमा के यहाँ आ जाता था..एक-दो दिन रह जाता था...वहां निम्मो बुआ फुफ्फाजी को बोल देती की वो अपने दोस्त के यहाँ है project complete करने गया है...कई बार राजेश भी PCO से फ़ोन कर देता की वो फलाना दोस्त के घर है...

सीमा अक्सर राजेश की मदद करती थी...क्योंकि सीमा को तो कंप्यूटर पर काम करने का शौक जो था॥ उसके physics project में diagrams बनाना..उसके लिए project का layout बनाना..वगरह वगरह....और राजेश thank you कह कर चला जाता था....अब राजेश भी कॉलेज में आ गया था..सीमा का भी MA first year complete होने को था...अब बारी राकेश की थी वो भी सीमा से मदद मांगने उसके यहाँ आया....उसको भी किसी project में सीमा की मदद की ज़रूरत थी...

सीमा का भाई सूरज college tour पे जा रहा था उसको सुबह सुबह ही train पकड़नी थी...स्टेशन सीमा के मामा के घर के पास था इसलिए सीमा के पापा और उसका भाई सूरज सीमा के मामा के घर गए हुए थे...उसका दूसरा भाई नील भी किसी दोस्त की birthday party में गया हुआ था...अब घर में सिर्फ़ सीमा की माँ,सीमा और राकेश ही थे....सीमा को नील का फ़ोन आया की वो आज रात घर नही आएगा..उसके दोस्त ने बहुत बड़ी party दी है..और उसको party में देर हो जायेगी...इसलिए वो वही सो जाएगा...अगले दिन सीमा का birthday था..तो सीमा ने नील को कहा कल घर जल्दी आ जाना...

सीमा राकेश का काम खत्म करने लगी...राकेश उसे बताता जाता वो करती रहती..बहुत देर तक काम करने पर काम पुरा हो गया..सीमा ने राकेश को floppy में project की soft copy डाल कर दे दी....dinner time होने वाला था...राकेश ने कहा की वो यही रुक जाता है...सीमा ने कहा "ठीक है..मगर घर फ़ोन कर दो".... राकेश ने घर अपनी माँ को फ़ोन करके बता दिया..की वो सुबह आएगा..सीमा की माँ भी खाना बनने लगी...और सीमा और राकेश TV देखने लगे...सीमा राकेश को बीच बीच में समझाने भी लगती की उसको board के exams की कैसी तैयारी करनी चाहिए....राकेश थोड़ा सा डरा हुआ था..जैसा की उसके पापा ने उसको 80% से उपर marks लाने को कह रखा था...

TV पे गाने आते तो सीमा भी साथ साथ में गुनगुनाने लगती...फिर तीनो ने मिल कर खाना खाया...और फिर तीनो थोड़ा सा TV देखने लगे.....तभी सीमा की माँ ने कहा की वो कुछ ज़रूरी सामान लेने बाज़ार जा रही है और TV देखने के बाद सीमा को बर्तन साफ़ करने है....सीमा ने कहा ठीक है वो कर देगी...

सीमा की माँ चली गई...सीमा तो TV देख रही थी..वो सोच रही थी..की कल उसका birthday है..वो क्या क्या करेगी...इस बार वो अपना birthday दोस्तों के साथ नही...माँ और पापा के साथ मनाना चाहती थी..उसने राकेश को भी बोला की वो कल पूरा दिन यही रुक जाए...

सीमा यादों में इतना खो गई थी की कब पीहू ज़ोर ज़ोर से रोने लगी उसे पता ही नही चला...शायद पीहू को भूख लगी थी...सीमा रसोई में गई और उसके लिए ढूध बोत्तल में डाल कर ले आई...पीहु को ढूध की बोत्तल पकड़ा कर उसने टाइम देखा तो... 2:30 बज चुके थे...

to be continue....
~'~hn~'~

Note : This story is only a Fiction, not real story, It is only for inspirational.

Tuesday, March 15, 2011

"निम्मो बुआ" (part 2)

सीमा फ़ोन रख कर रसोई में काम करने चली गई..मगर दिमाग अभी भी वही अटका हुआ था..क्षितिज कब रसोई में आया उसे पता ही नही चला..क्षितिज बोला "क्या बात है. पापा क्या बोल रहे थे.....निम्मो बुआ जी कब आएँगी सुबह सुबह या शाम को"....क्षितिज की आवाज़ से सीमा चौक गई.. "हाँ सुबह सुबह ही 11-11:30 बजे शायद"..सीमा ने जवाब दिया..।

रसोई का काम ख़त्म कर जब सीमा अपने कमरे में पहुची तो पीयूष सो चुका था...और पीहू को भी क्षितिज सुलाने की कोशिश कर रहा था....क्षितिज पीयूष को माँ के पास छोड़ कर आया और इधर पीहू को सीमा ने सुला दिया....

"क्या बात है॥तुम निम्मो बुआ जी के आने की बात से परेशान हो..वो बस invitation ही तो देने आ रही है" क्षितिज ने पुछा। सीमा बोली "मगर क्षितिज वो...निम्मो बुआ जी..यहाँ क्यूँ आ रही है..पापा के घर invitation दे दिया तो यहाँ क्यूँ..तुम तो जानते हो निम्मो बुआ जी के सामने में बिल्कुल अजीब सा behave करने लगती हूँ"...क्षितिज सीमा को समझाने लगा.."हाँ मैं जानता हूँ तुमको वो अच्छी नही लगती...तुम क्यूँ बार बार पुरानी बातें सोचती हो...invitation ले लेना..अब शादी में जाना ना जाना तुम पर है ना..."

क्षितिज थोडी देर तक सीमा को समझाता रहा॥फिर वो ऑफिस से थका हारा घर आया था..इसलिए सीमा ने सोने को कह दिया....क्षितिज ने उसे भी सोने को कहा....सीमा और क्षितिज दोनों लेट गए...क्षितिज थोडी देर में सो गया....मगर सीमा की आंखों में नींद कहाँ थी..बार बार पुरानी यादें जो उसका पीछा नही छोड़ रही थी...हर बार जब भी निम्मो बुआ या उनके घर से कोई भी ख़बर उसके पास आती थी तो सीमा को बार बार वो बातें याद आती थी जिनको वो चाह कर भी भूला नही पाती थी..और अब इस बार तो निम्मो बुआ ख़ुद उसके घर आ रही थी...

निम्मो बुआ बहुत ही शांत सवभाव की थी...सीमा के पापा के बाद वही घर की बड़ी थी..उनकी शादी किसी गाँव के घर हुई थी....उनको शादी के बाद एक गाँव में ले जाया गया मगर वहां बुआ को अच्छा नही लगता था...और सीमा के फूफाजी भी बड़े ही गुस्सेल मिजाज़ के थे....फिर वो बार बार माँ के घर आ जाती थी...सीमा की माँ ने उसे बताया था की उसकी बुआ कितने महीनो-महीनो तक रह रह कर जाती थी..हर बार वहां से लड़ कर आ जाती थी..फुफ्फाजी भी बड़े नाटक किया करते थे.... उनको ले जाने आते थे...पर यहाँ कर लड़कर चले जाते थे....और सीमा के पापा बुआ को फुफ्फाजी के साथ समझा भुजा कर भेज देते थे॥

फिर वो यही शहर में ही किराये का मकान ले कर रहने लगे..बुआ जी ने आस पास ही कोई छोटी सी नौकरी ढूंढ ली थी...फूफ्फा जी भी बैंक में काम करने लग गए थे...दोनों यहाँ शहर में अपनी गृहस्थी चला रहे थे.....मगर बीच बीच में उनके बीच कहा सुनी होती रहती थी...बुआ जी जितने शांत सवभाव की थी उतने ही फुफ्फाजी गुस्सेल थे...बुआ का अपने मायके में आना जाना चालू था.. सीमा की माँ ने उसे बताया था..बुआ अपने बच्चो को भी सीमा की माँ के पास छोड़ कर बहार काम करने जाती थी....बुआ जी के तीन बेटे थे...रमेश, राजेश और राकेश..रमेश सीमा की उमर का ही था..वो रमेश से 6 महीने ही बड़ी थी...फिर राजेश जो की 2 साल छोटा था....और फिर राकेश जो 4 साल छोटा था...वैसे सीमा के भी दो छोटे भाई थे... सूरज 1 साल छोटा..और नील 3 साल छोटा....सीमा एक joint family में बड़ी हुई थी...उसके चाचा चाची के बच्चे भी थे...सब मिल जुल कर खेला करते थे..खूब मज़े करते थे..सीमा तो सबकी लाडली थी...माँ , पापा, दादा और चाचा सब उसे सबसे जयादा प्यार करते थे...पापा की लाडली तो थी ही...निम्मो बुआ भी बहुत लाड करती थी..निम्मो बुआ को तो हमशा से एक बेटी चाहती थी..सीमा बड़ी थी इसलिए वो सब बच्चो का अच्छे से ख्याल रखती थी॥

सीमा की चाची सीमा की माँ से हमेशा छोटी छोटी बातों पर कलेश करती थी... इसलिए सीमा के पापा ने अलग घर ले कर रहने का फ़ैसला किया और सीमा अपने माँ, पापा और भाइयो के साथ अलग रहने लगी...अब निम्मो बुआ के घर छुट्टियों में ही जाना होता था...बुआ के घर बदलते रहते थे...बुआ उसको प्यार से रखती थी....रमेश तो उसका दोस्त जैसा था...और बाकी दोनों राजेश और राकेश वो अपने भाइयो जैसे ही प्यार करती थी....सब साथ में खेलते रहते थे...इसलिए सभी सीमा को नाम से बुलाते थे..बस फूफाजी से थोड़ा डर लगता था...तीनो बच्चे बहुत डरते थे फूफ्फा जी से...सीमा को तो ऐसे डरे डरे माहोल में रहने की आदत नही थी..वो तो बिल्कुल बिना डरे फुफ्फाजी के साथ भी बात कर लेती थी...फूफ्फा जी भी उस से प्यार से बात करते थे..क्योंकि वो उनके घर मेहमान थी और लड़की थी....वो सीमा की छोटी छोटी बातों को नज़र अंदाज़ कर देते थे..मगर अगर वही चीजे अगर उनके बच्चो ने की होती तो उनको खूब सुनाते थे...

सीमा यह सब सोच रही थी की तभी अचानक रसोई में से आवाज़ आई....सीमा अपनी पुरानी यादों से बाहर आई...और रसोई में देखने चली गई...वहां माँ fridge से पानी ले रही थी.."अरे बहु तुम अभी तक सोयी नही...पीहू तंग कर रही है क्या"..माँ ने सीमा को देख कर पुछा...सीमा बोली "नही माँ वो तो सो रही है...बस रसोई की आवाज़ सुन कर नींद टूट गई...." सीमा वापस अपने कमरे में आई तो देखा 1:30 बज चुका था....सीमा को सुबह जल्दी उठाना था...इसलिए वो फिर सोने की कोशिश करने लगी...

to be continue....
~'~hn~'~

Note : This story is only a Fiction, not real story, It is only for inspirational.

Monday, March 14, 2011

"निम्मो बुआ" (part 1)

रात के 9 बजे थे और सीमा हर रोज़ की तरह खाने के लिए dinning table लगा रही थी. "क्षितिज, माँ, पीयूष..सभी लोग आ जाओ। खाना तयार है।" सीमा ने ज़ोर से आवाज़ लगाई।

"आ रहे है।" क्षितिज का जवाब आया। माँ भी पीयूष और पीहू के साथ आ गयी। माँ ने पीहू को सोफ्फे पर बिठा कर सीमा से कहा "पीहू को भी भूख लगी है। उसके लिए दूध की बोत्तल तैयार कर लो बहु।"

"जी माँ।" सीमा ने प्यार से कहा और दूध की बोत्तल तैयार करने रसोई में चली गई। क्षितिज भी हाथ मुह धो कर टेबल पे आ गया। फिर सभी टीवी देखते देखते खाना खाने लगे।

"सीमा कहाँ हो..सुनो तुम भी टेबल पे आ जाओ।" क्षितिज ने कहा। सीमा रसोई से निकलते हुए बोली "आ रही हूँ।"

सीमा और क्षितिज की शादी हुए 8 साल हो चुके थे. पीयूष (5 साल) और पीहू (1+ साल) दो बच्चो के साथ उनकी ग्रहस्थी ठीक-ठाक चल रही है। क्षितिज की माँ सीमा को दिलोजान से चाहती है। दिनभर बस बहु के गुणगान करती रहती है।

सीमा पीहू को बोत्तल थमा कर खाना खाने के लिए आ गई। "पीयूष बेटे तुमने हलवा तो लिया ही नही। चलो जल्दी से इसे भी ख़त्म करो।" सीमा ने उसकी प्लेट में हलवा डालते हुए कहा। सीमा जानती थी की पीयूष को गाज़र का हलवा बिल्कुल पसंद नही पर वो चाहती थी पीयूष सभी कुछ खाए..बढ़ते बच्चो को सभी कुछ खाना चाहिए।

करीब 10 बजे सभी का खाना ख़त्म हो गया था। सीमा रसोई में कुछ काम करने चली गई। पीहू का दूध भी ख़त्म हो गया था और अब वो खेल रही थी। क्षितिज ने उसे उसके सारे खिलोने ला कर दे दिए थे। पीयूष भी ball से खेल रहा था।

"trin trin....trin" तभी फ़ोन की घंटी बजी। क्षितिज ने फ़ोन उठाया और बात करने लगा। फिर थोडी देर में बोला। "सीमा तुम्हारा फ़ोन है..पापा का।" सीमा रसोई से बाहर आ कर फ़ोन क्षितिज से लेकर बोली "हेल्लो! पापा। हाँ बोलो। आप कैसे हो? सब ठीक है ना...मम्मी की तबियत कैसी है..."

बातों बातों में सीमा को पता चला की कल छुट्टी के दिन निम्मो बुआ उसके घर आ रही है। उनके छोटे बेटे राकेश की शादी है। वो उसी अवसर का निमंत्रण पत्र देने आ रही है।

निम्मो बुआ का नाम सुनते ही सीमा कुछ परेशान सी हो उठी। न जाने उसे क्या हो गया था। आगे की बातें भी उसने ध्यान से नही सुनी। राकेश की शादी!! राकेश की शादी!! निम्मो बुआ घर आ रही है!! निम्मो बुआ घर आ रही है!! बस बार बार यही शब्द दिमाग में घूमने लगे....

to be continue....
~'~hn~'~

Note : This story is only a Fiction, not real story, It is only for inspirational.

Saturday, March 12, 2011

Why



When I was sitting and waiting for you to enter my life,
you were busy in talking with some other girl...
but now I am stand-up and ready to move forward my life,
then why you want to come near me...
 

When I was always dreaming about you and myself,
you were planning new life with someone else...
But now I am wake-up and stopped thinking about you,
then why you are starting dreaming about me...



When I was ready to give you anything whatever you would say,
you said you knew what you want and you were chasing that only..
But now I know already that there is nothing I really can give you,
then why you want one more chance from me...
 

When I was expecting that you would understand my love signs,
you were not even looked and noticed those signs....
but now I am stopped giving those signs and signals,
then why you are seeing those signs by making your own all's...
 ~'~hn~'~

Monday, March 7, 2011

मैं एक लड़की हूँ

"मैं एक कली हूँ खिलने दो मुझे....
मैं एक सुगंध हूँ महकने दो मुझे॥
"





क्यों है यह बंधन क्यों है यह सीमाए,
क्यों है यह उदासी क्यों है इतनी यहाँ पीडाए॥
क्यों आज भी मैं लक्ष्मी होकर पराई हूँ
क्यों आज भी बहु ही रहकर बेटी नही बन पायी हूँ॥ 




"मैं एक रत्न हूँ चमकने दो मुझे....
मैं एक कंगन हूँ खनकने दो मुझे॥ "



आजाद होने को मन था कबसे बेताब..
पाना चाहती थी बस अपना बराबरी का खिताब॥
आजाद होकर भी मैं अभी भी कैद हूँ
साथ चलते हुए भी मैं कितनी पीछे हूँ॥




"मैं एक तार हूँ बजने दो मुझे....
मैं एक जल तरन हूँ चलने दो मुझे॥ "



  

खुला आसमान है फिर क्यों मुझे उड़ने नहीं है देते..
क्यों पर निकलने से पहले ही मुझे तुम बाँध है देते॥
क्यों हमको माँ ने ही नहीं दिया सहारा
क्यों बाप ने ही कर दिया यूँ पराया॥ 



"मैं एक सुंदर परी हूँ उड़ने दो मुझे....
मैं एक बाबुल की चिडी हूँ चहकने दो मुझे॥ "



 


क्यों नहीं है आज सबके पास मेरे सवालो के जवाब..
क्यों अपना ही हमसफ़र राह में पहन लेता है नकाब॥
जब बात आती है साथ देने की तो क्यों वो गुम हो जाता है
जब बात होती है मुझको समझने की तो क्यों वो मुझे ही समझाता है॥





"मैं एक रौशनी हूँ फैलने दो मुझे....
मैं एक रंग हूँ रंगने दो मुझे॥ "



 


हर कन्या को हर कोई माँ दुर्गा कह पूजता जहाँ..
क्यों जन्म देते ही मरती लड़कियां वहां॥
लड़को के अरमानो को है पूरा किया जाता
क्यों लड़कियों को ही है दबाया जाता॥ 





"मैं एक तितली हूँ बगिया की होने दो मुझे....
मैं एक बरखा हूँ हर तरफ़ बरसने दो मुझे॥ "



मैं एक कोख हूँ पनपने दो मुझे....
मैं एक बीज हूँ अंकुरित होने दो मुझे॥
मैं एक तस्वीर हूँ अस्तित्व्त लेने दो मुझे..
मैं एक मिटटी हूँ कोई रूप लेने दो मुझे॥

 

मैं एक खवाब हूँ पूरा होने दो मुझे...
मैं एक दिल का अरमान हूँ मचलने दो मुझे॥
मैं एक खुशी हूँ खुल कर हसने दो मुझे...
मैं एक लड़की हूँ इस जहाँ में जीने दो मुझे॥ 
 

"मैं एक डरी सहमी आखें हूँ देखने दो मुझे....
मैं एक अजन्मी लड़की हूँ इस कोख से जन्म लेने दो मुझे॥ "
~'~hn~'~


Happy Women's Day

Saturday, March 5, 2011

ज़रा गौर फ़रमाए (4)

दिल की कही को जो कई अरमान बना दे वो प्यार है।
दिल की गुस्ताखी को दिल की लगी बना दे वो प्यार है।
हम तो हमेशा कहेंगे की हाँ हमें तुम से प्यार है।
न जाने कब जवाब आएगा की तुमको भी हम से प्यार है।
~'~hn~'~

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एक दुल्हन अपने दुल्हे की बारात देखते हुए सोचती है।
किसी को बताती नहीं है बस यूहि यह बात दिल में रखती है।
इससे पहले तुमको जब भी देखा बस मैंने यूहि देखा।
पर आज जब देखा तो लगा वाह यह मैंने क्या देखा।
पहले मैंने सोचा था तुम मेरे लिए यार,प्यार,दिलदार हो।
आज तो तुम घोड़ी पे बैठे मेरे वो ही सपनो के राजकुमार हो।
~'~hn~'~

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क्या कहूँ कैसे लग रहे हो,
handsome,dashing,smart जो भी कहो,
मगर इस white dress में तुम अच्छे लग रहे हो....

~'~hn~'~

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क्या कहूँ यह जो खुशी आपके चेहरे पे नज़र आ रही है |
क्या राज़ छिपा था इतने दिन दिल में यह कहे जा रही है ||
इन खुशियों के पीछे कोई भी हो जो भी है आपको बहुत रास आ रही है |
चेहरे को चहका रही है या प्यार है जो किसी के लिए आपका बता रही है ||
~'~hn~'~

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यह तो दिल के लब्ज़ है अपने आप शायरी का रूप ले लेते है।
हम तो बस दिल की कहते है और लोग हमें शायर कह देते है॥
~'~hn~'~

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बस यू ही ऐसे ही मस्त लाइन बन गई बातों बातों में।
दिल के अरमानो को शायरी की शक्ल मिल गई बातों बातों में॥
~'~hn~'~

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ऐ दोस्त तू कहे तो किताब क्या, कहानियो की लाइब्रेरी लिख दूँ।
बस दिल की जो बातें है उनको तू कलम दे और मैं उन्हें शब्दों की शक्ल दे दूँ॥
~'~hn~'~

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अरे यार तेरे पीछे ना जाने मैने क्या क्या कह दिया।
बातों ही बातों में मैंने देखो बहुत कुछ कह दिया॥
~'~hn~'~

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आज शायद किसी की आत्मा हम पर मेहरबान हैं,
यह मेरी नहीं यह उन्हीं की जुबान हैं।
बातों बातों में ही लाइन बना लेती हूँ,
ये उनका ही एक अंदाज़ हैं॥
~'~hn~'~

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Wednesday, March 2, 2011

ज़रा गौर फ़रमाए (3)

try, try i am always keep trying
because nothing will be mine if i am crying
~'~hn~'~  

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problem, problems, around, surround,
they are always here and there,
but I know they all can be handled
as I always found my friends there
~'~hn~'~  

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ज़रा सा ज़िन्दगी को हल्का कर और जी,
प्यार के लम्हों को बड़ा कर और ले चुस्की।
मगर इस तरह बेफिक्र होकर भी न जी,
कि तुझे ख़बर ही न हो और किसी की॥
~'~hn~'~  

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कोई नहीं है फिर मेरा दिल क्यों बार बार,
किसी को अपना बनाने को मजबूर करता है।
फिर ना जाने क्यों इस मतलबी दुनिया में,
वो किसी का इतना इंतज़ार करता है॥
~'~hn~'~  

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यह दिल की बातें है हर किसी को भाँती है,
हर किसी को.. किसी न किसी की याद दिलाती है।
लिखता कोई है.. कहता कोई है और.. किसी और को बहलाती है,
किसी को भी सुनाओ.. सबको अपनी आप-बीती ही लगने लग जाती है॥
~'~hn~'~  

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मेरे आने से भी बागो में बहार ना आई,
अब न जाने क्या होगा।
न जाने कब इन अजनबियों की महफिल में,
हमारा नाम भी दोस्तों में शामिल होगा॥
~'~hn~'~  

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अगर मेरे यहाँ होने से अगर कोई बेवजह नाराज़ हो।
तो इससे अच्छा है कि मेरा यहाँ फिर कभी आना ही न हो॥
~'~hn~'~  

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कोई तो है यहाँ जो मेरा दोस्त है।
इतनी भीड़ में भी वो देखता सिर्फ़ मुझको है॥
वरना सब यहाँ हैं एक दुसरे में खोने वाले।
किसी न किसी को एक दुसरे के पीछे करने वाले॥
~'~hn~'~  

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हम उन में से है जो सागर में नहीं उतरते है।
बस किसी को डूबता देख कर उसकी गहराई को नाप लेते है॥
~'~hn~'~  

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हम किसी के लिए नहीं आते,
किसी के लिए नहीं जाते।
बस लोग सामने से गुजर जाते है,
और हम किसी को नज़र नहीं आते॥
~'~hn~'~  

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